दोस्तों, आज मैं खुश हूं। यह खुशी आपसे मुलाकात की है। इस मुलाकात के लिए मैं पिछले लम्बे समय से चाहत रख रहा था। चाहत अब से चंद सैकंड पहले ही पूरी हुई। अगले हर पल आप लोगों का सुखद सान्निध्य पाता रहूं ऐसी कामना है। मैं चाहता हूं कि मैंने अब तक जो किया, जो मैं कर रहा हूं और जो मैं करना चाहता हूं। उसे ब्लॉग के जरिए आप सभी से साझा कर सकूं। मुझ में हर नए दिन की शुरुआत के साथ कुछ नया करने की ललक रहती है। उसे शिद्दत से पूरा करने की जद्दोजहद में हर दिन करना होता है...सच का सामना। ये ब्लॉग ऐसी ही सच्चाइयों से अब आपकों भी कराता रहेगा रू-ब-रू।

Friday, October 8, 2010

सुख चाहो तो हो जाओ तैयार

सन्तोष गुप्ता
शहरी विकास के पट खुल गए हैं। अगले दो-ढाई साल में चूरू का रंग-रूप और स्वरूप अदला-बदला सा होगा। वह दिन कैसा होगा? जब चूरू में गंदे पानी की एक भी गैनाणी नहीं होगी। पेयजलापूर्ति निर्बाध और पर्याप्त हो सकेगी। नालियों से पानी का सहज निकास होगा। घरेलू कचरे का उचित प्रबंधन होगा। यातायात सुधरेगा। शहर का फैलाव होगा। नई कॉलोनियां विकसित होंगी। लोगों को शुद्ध और स्वच्छ हवा मिलेगी। शहर साफ और सुन्दर दिखेगा।
चूरू में ऐसा होगा यह जानकार अभी से ही सुखद अहसास होने लगा है। आरयूआईडीपी के माध्यम से शहरी विकास पर करीब 8 8 करोड़ रुपया खर्च होने को है। यह राशि शहर की दशा और दिशा बदल देगी। शहरी ढांचागत विकास के शुरू होने के साथ शहर के सहस्त्रों हाथों को काम मिलेगा। निर्माण कार्य से जुड़े लोगों को व्यवसाय मिलेगा। हर एक की नेक नीयत और नैतिकता यदि शहर के विकास में निहित होगी तो निश्चित ही पीढिय़ों तक दुआएं पाने वाला काम हो जाएगा।
पर यह भी सत्य है कि हर सुख की इमारत दुख के भोग की नींव पर ही खड़ी होती है। चूरू के विकास और नव निर्माण के इस काम में जहां शहरवासियों की जागरुकता जरूरी है वहीं उनका सहयोग भी अपेक्षित है। कोई भी निर्माण सुकून बाद में देता है पहले व्यवधान और बाधाएं सहता है। इस काम में भी बाधाएं आएंगी और व्यवधान भी होंगे। शहर की सड़कें और गलियां खुदेंगी। नालियां मिट्टी से भरेंगी। गंदा पानी सड़कों पर बहेगा। यातायात बाधित होगा। घरों से बाजार तक और बाजार से घर तक आवागमन महीनों तक प्रभावित रहेगा। ग्राहकी में मंदी आएगी। रात की नींद और दिन का सुकून खो जाएगा। इतनी तोडफ़ोड़ होगी। लेकिन शहरवासियों को सब कुछ खुशी से सहना पड़ेगा। इतना ही नहीं यथा योग्य सहयोग भी देना होगा।
यहां चिंता और चिंतन का विषय यह है कि सरकारी प्रक्रिया और लालफीताशाही में सब कुछ उलट-पुलट हो गया।

आरयूआईडीपी पहले पेयजल वितरण प्रबन्धन का कार्य शुरू करने जा रही है। सीवरेज का काम आरम्भ करती तो च्यादा बेहतर होता। उसके पीछे-पीछे ही नई पेयजल लाइन डालने का काम भी शुरू हो जाता। जिससे सड़कों का फिर से निर्माण हो जाता। लोगों को ज्यादा दिन तक आवागमन में परेशानी नहीं भोगनी पड़ती। इसके पीछे तर्कसंगत कारण यह है कि सीवरेज के पाइप, पानी के पाइप से अधिक व्यास के होने व अधिक गहराई में डाले जाने हैं। यदि एक बार सड़क खोद कर पानी की लाइन डाल दी जाएगी तो सीवरेज कार्य में काफी बाधा आएगी। जबकि सीवरेज लाइन को जगह-जगह गली मोहल्लों में होते हुए सीघे घरों से भी जोड़ा जाएगा। शहर की सड़कें और गलियां इतनी चौड़ी भी नहीं हैं कि सीवरेज के लिए खोदी जाने वाली सड़क और पेयजल के लिए खोदे जाने वाले गड्ढ़ों के बीच की दूरी एक-दूसरे काम को प्रभावित न करे।
अब भी प्रशासन और शासन के पास समय है कि वह इस विषय पर यथा शीघ्र विचार करे। सीवरेज कार्य को जितना जल्दी हो सके प्रारम्भ किया जाए। हो सके तो जब तक पेयजल के लिए उच्च जलाशयों का निर्माण हो या पम्पिंग स्टेशन बने तब तक सीवरेज का काम युद्ध स्तर पर शुरू हो जाए।कहीं ऐसा न हो कि पेयजल लाइन डालने का कार्य पूर्ण होने पर सीवरेज का कार्य प्रारम्भ हो। इससे समय, श्रम और धन सब कुछ मिट्टी में चला जाएगा। राच्य के अनेक शहरों में जहां सीवरेज और पेयजल योजनाओं के क्रियान्वयन में समन्वय और तालमेल का अभाव रहा है वहां की जनता आज तक परेशानी भोग रही है और करोड़ों की राशि मिट्टी में मिल गई है। प्रशासन को चाहिए कि वह यह भी सुनिश्चित करे कि सीवरेज और पाइप लाइन डालने के बाद शहर की सड़कें फिर से वैसी ही गुणवत्ता पूर्ण बन जाएं जैसी हाल में हैं। शहर की सड़कों को बने च्यादा दिन नहीं हुुए हैं। वर्षों की तकलीफ भोगने के बाद लोगों को राहत मिली है। शहरवासियों को राहत और शहर का सुकून बना रहे सभी ऐसी उम्मीद करें।
santosh.gupta@epatrika.com

Wednesday, September 22, 2010

कौन जाने हाल-ए-दशा

-सन्तोष गुप्तासावन से लेकर भादो तक बरसात का लगातार बना रहना अब आम जिंदगी को प्रभावित करने लगा है। जहां देखो वहीं जीवन की रफ्तार धीमी पड़ गई है। रोजमर्रा के कामकाज तक प्रभावित होने लगे हैं। हर आम और खास किसी न किसी को लेकर जान-माल की सुरक्षा की चिंता से ग्रसित है। काश्तकार को धान की तो व्यापारी को माल की सुरक्षा का ख्याल सता रहा है। नौकरी पेशा घर से दफ्तर तक सुरक्षित आवागमन के लिए मन ही मन हनुमान चालीसा का पाठ करता नजर आता है। स्कूल और कॉलेज पैदल आने-जाने वाले बच्चों और बच्चियों की तो जैसे हर क्षण जान सांसत में ही बनी रहती है। जाने कब कौन किस घड़ी किस रूप में यमराज बन उन्हें लेने आ जाए? मंदिर-मस्जिद जाने वाले बुजुर्ग स्त्री और पुरुष तो अब घर की देहरी से बाहर कदम बढ़ाते ही राम और रहीम का जाप करने लगे हैं।जिले भर की सड़कों के हाल इतने बुरे और बदहाल है कि उनके लिए लिखने को ही शब्द सुझाई नहीं देते। गली-मोहल्ले से लेकर मुख्य बाजार और राष्ट्रीय राजमार्ग तक बद से बदतर खस्ता हालत में हैं। सड़कों पर लम्बे-चौड़े गड्ढ़े हर क्षण हादसे को दावत देते दिखाई देते हैं। पैदल चलने वाला हो या वाहन चालक सड़क से सुरक्षित गुजरना तो जैसे चुनौती हो गया है। इन्द्रदेव की मेहरबानी ने गड्ढ़े में पानी भर कर रही सही कसर पूरी कर दी है। जहां इन्द्रदेव मेहरबान नहीं हुए हैं वहां की नगर परिषद की कथित अनदेखी या लापरवाही ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं। शहरी क्षेत्र हो या ग्रामीण कस्बाई हर जगह नाले और नालियां गंदगी के ढेर से अटी हुई हैं। नाले और नालियों में पानी के प्रवाह के लिए कोई जगह ही नहीं बची है। उसमें इतना कूढ़ा-करकट भरा है कि मवेशी भी बिना फंसे और धसे उस पर से गुजर कर निकलने में फख्र महसूस करने लगे हैं। नाले और नालियों का पानी सड़कों पर दरिया की तरह बह रहा है। ऐसे में सड़कों पर गड्ढ़ों का पता ही नहीं चलता। कौनसा बढ़ता कदम जिंदगी का आखिरी कदम हो जाए? आए दिन सड़कों पर वाहनों के गड्ढ़े में गिरकर दुर्घटनाग्रस्त होने की सूचनाएं मिलती रहती हैं। लोग कहने लगे हैं कि सड़क पर गड्ढे हैं कि गड्ढ़े में सड़क? दुर्भाग्य तो यह है कि इस सब के लिए फिक्रमंद, चिंतक और आलोचक सब आम नागरिक ही है। उन लोगों को इन हालातों की कतई चिंता नहीं जो लोग इन समस्याओं के निस्तारण के लिए सक्षम और जवाबदेह हैं। जिला प्रशासन और नगरपरिषद व पालिकाओं में तो सड़कों की मरम्मत और नाले-नालियों की सफाई के लिए पहुंचने वाले ज्ञापनों को तो अब कचरे की टोकरी में भी नहीं डाला जाता बल्कि इनके बंडल बांधकर सीधे दफ्तरों में ही स्थित कुएं में पटक दिया जाता है। शहर और कस्बाई नागरिकों को पूरे आत्मविश्वास से भरोसा दिलाया जाता है कि समस्या का शीघ्र ही समाधान कर दिया जाएगा। जिले में चहुंओर हाल ही में स्थानीय निकाय चुनाव हुए हर किसी जनप्रतिनिधि ने अपने क्षेत्र की सड़क, सफाई और रोशनी की समस्याओं से निजात दिलाने का भरोसा दर्शाया था। आज कोई भी न सुनने वाला है न देखने वाला। जिला प्रशासन से तो उम्मीद ही क्या की जा सकती है। बंद कमरों में बैठ कर बीस सूत्री, पंद्रह सूत्री बैठकों के आयोजन कर और आंकड़ों का पजलगेम खेल कर जनता जनार्दन को उल्लू बनाने के सिवाय कोई काम नहीं है। प्रशासन ने आपदा प्रबन्धन के लिए खास तौर पर इन्तजाम किए होते हैं। क्या बांध के टूटने पर ही वहां मिट्टी से भरी बोरियां डलवाई जाएंगी? खस्ताहाल सड़कों पर रखरखाव के कोई प्रबन्ध किया जाना जिला प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है? क्या प्रशासन को उनलोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करनी चाहिए जिनकी निगरानी और जिम्मेदारी में सड़कों का निर्माण होता है और वह निश्चित मियाद या उम्र से पहले ही उधड़ जाती है? ठेकेदार को नोटिस देना उसका पैसा रोक लेना ही क्या कार्रवाई की श्रेणी में आता है? उन अभियंताओं पर गाज क्यों नहीं गिराई जाती जिन्होंने जनता से लेकर सरकार तक का भरोसा तोड़ा है? संवेदनशील सरकार और जवाबदेह प्रशासन का यही प्रमाण है तो ओर बात है नहीं तो अब समय आ गया है जब सरकार और प्रशासन दोनों जनता की हाल-ए-दशा की सुध लेवें।

हो गई अग्नि परीक्षा

- सन्तोष गुप्तासादुलपुर में रेलवे स्टेशन पर मंगलवार रात्रि जो हुआ वह अप्रत्याशित ही नहीं अकल्पनीय था। जातरू बालिका की चीख से उठी चिंगारी ने दावानल का रूप ले लिया और प्रशासन मुंह ताकता रह गया। बालिका के साथ जो हुआ वह किसी पिशाच का ही काम हो सकता था। इन्सान के चेहरे में आबादी के बीच घूमते पिशाचों को भला कौन पहचाने? तकलीफ तो तब पहुंचती है जब किसी से रक्षा और सुरक्षा की आस लगाई जाए और वह ही भस्मासुर बन जाए। बालिका से ज्यादती हर हाल में असहनीय और निंदनीय कही जा सकती है। दोषियों पर इसके लिए खुदा का कहर भी बरपे तो कम होगा। पर पीडि़त के भाई का रेलवे सुरक्षा बल के जवानों से मदद मांगना गैरवाजिब किसी भी सूरत में नहीं कहा जा सकता। भले यह सही है कि रेलवे सुरक्षा बल की जवाबदेही रेलवे की सम्पत्ति के सुरक्षा और संरक्षा में है। रेल से सफर करते यात्री या रेलवे स्टेशन परिसर में विश्राम करते मुसाफिर के साथ होने वाली किसी भी आपराधिक वारदात का उनसे कोई वास्ता नहीं। इसके लिए राजकीय रेलवे पुलिस जिम्मेदार है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि खाकी वर्दी पहनने वाला किसी संस्था अथवा संगठन का सवैतनिक मुलाजिम पहले है या एक संवेदनशील इन्सान? इन्सान होने के नाते क्या समाज और प्राणी के प्रति उसका कोई दायित्व नहीं? पीडि़ता की चीख और उसके भाई की गुहार सुन कर यदि प्रदेश और देश के कोने-कोने से आए विभिन्न जाति, धर्म, समाज और प्रांत के जातरुओं में मानवीयता और इन्सानियत जाग गई तो उन खाकी वर्दी वालों की संवेदना कहा चली गई? दोषियों को पकडऩा अथवा उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करना यदि रेलवे सुरक्षा बल के जवानों के क्षेत्राधिकार में नहीं था तो न सही, पीडि़त की मदद में सहानुभूति के दो बोल और सहायता में राजकीय रेलवे पुलिस से समन्वय का काम तो किया ही जा सकता था। वारदात की अनदेेखी और पीडि़त की पिटाई ने जातरुओं के रगो में बहने वाले लहू को किस तापमान तक उबाल दिया इसका नतीजा सबके सामने है। बरसों की पीड़ा और दशकों की मांग के बाद सादुलपुर के वाशिन्दों को बड़ी लाइन की गाडिय़ां और नया रेलवे स्टेशन नसीब हो पाया था। पलक झपकते समूचा रेलवे स्टेशन धू-धू कर जल गया। अब इसके फिर से दुरुस्त होने में कितना वक्त लगेगा फिलहाल कहा नहीं जा सकता। लाखों लोगों की मिन्नतें और मुरादों के बाद जब कोई चीज मिलती है तो उसके खोने का गम आसानी से नहीं जाता। रात के काले साए में स्टेशन के चहुंओर से उठती आग की लपटे ददरेवा मेले में लोकदेवता गोगादेव को धोक लगाने आए आस्थावान और श्रद्धावान जातरुओं के अन्र्तमन में धधकती ज्वाला का प्रत्यक्ष प्रदर्शन था। अब यह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।हर कोई जानता है विपदा घंटी बजा कर नहीं आती। जब आती है तो सम्भलने का अवसर भी नहीं देती। इसी लिए शासन-प्रशासन प्रजा की सुरक्षा और संरक्षा के तमाम इंतजाम ऐहतियातन करके रखता है। सादुलपुर रेलवे स्टेशन पर शासन और प्रशासन की ओर से ददरेवा लखी मेले के चलते ऐसे कोई इन्तजाम नहीं होना खेदजनक है। ट्रेनों में जातरुओं के ओवरलोड पहुंचने से हर कोई वाकिफ था। इसे देखते हुए शासन और प्रशासन को पहले से ही अतिरिक्त फोर्स का इन्तजाम करना था। यहां तक कि मेले आयोजन में किसी भी स्थिति से निपटने के लिए सीसी टीवी कैमरे और रेपिड एक्शन फोर्स, वीडियो ग्राफी तो साधारण तैयारियों में गिनी जाती है। विशेष तौर पर तब जब देश में नक्सली और आतंकी घटनाओं की हर क्षण आशंका बनी हुई है। आरपीएफ, जीआरपी यहां तक की सिविल पुलिस भी स्टेशन परिसर में मौजूद हजार-डेढ़ हजार जातरुओं के रोष को घंटों तक काबू करने में नाकाम ही रही यह आश्चर्य जनक रहा। जिला मुख्यालयों पर बैठे आलाधिकारियों के घरों पर घंटियां भी कब से घनघनाती रहीं पर वे हरकत में तब आए जब हालात पूरी तरह हाथ से निकल गए। रेलवे सुरक्षा बल के दफ्तर पर पथराव, प्रदर्शन और कब्जा कर हथियार लूट ले जाना, जीआरपी थानाधिकारी की जीप को आग लगा देना आजादी के आन्दोलन सरीका सा नजारा था। सुरक्षा और संरक्षा के प्रहरियों के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार पर आमजन का आक्रोश यदा-कदा देखने और सुनने को मिलता रहा है। श्रद्धा और आस्था में डूबी जनता का खाकी वर्दी के प्रति सम्मान और समर्पण भाव इस तरह टूटने लगेगा तो तमाम सामाजिक व्यवस्था ही छिन्न-भिन्न हो जाएगी। घटना के बाद रेलवे स्टेशन को त्वरित खाली कराया जाकर पुलिस अपने कब्जे में ले लेती तो भी ऐसा नहीं होता जैसा दावानल बाद में धधका। शेखावाटी अंचल खाटू श्यामजी, सालासर बालाजी, राणीसती, गोगामेढ़ी मेलों के आयोजन के साथ लोक संस्कृति के संरक्षण का वाहक रहा है। लाखों लोग रात-रात भर पैदल चलकर सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को अक्षुण्य बनाए हुए हैं। आने वाले कल में भी खाकी वर्दीधारियों ने जनता और लोकसेवा के प्रति अपने व्यवहार का आत्मावलोकन कर उसमें सुधार नहीं किया तो अंजाम क्या होगा कहा नहीं जा सकता। यदि इस घटना को प्रशासन की अग्निपरीक्षा कहा जाए तो वह तो इसमें फेल ही साबित हुआ।

Monday, June 21, 2010

पापा बहुत याद आते हो....


सन्तोष गुप्ता
मैं जब भी आपके पोते कुक्कू को समझाता हूं पापा आप बहुत याद आते हो। मुझे ठीक से याद नहीं क्या मुझे लेकर आप भी ऐसे ही तनावग्रस्त रहा करते थे? जैसे आज मैं रहता हूं? उसके प्रति चिंता मेरी कभी खत्म होगी कि नहीं मैं नहीं जानता। बस इतना जानता हूं कि आज वह अठारह बरस का होने को है उसके भविष्य को लेकर मैं अब तक आश्वस्त नहीं हो सका हूं। बड़ा होकर वह क्या बनेगा? आगे चलकर वह क्या करेगा? जानता हूं भाग्य उसका है पर परवरिश तो मेरी है ना पापा? मैं उसकी परवरिश में कोई कमी नहीं रख रहा फिर भी चिन्तामुक्त नहीं हो पाता। ऐसा क्यों है पापा?
पापा शायद आपको याद हो आपके रहते मैं भी दो बच्चों का पिता बन गया था। पिता बनने की खुशी कैसी होती है मैंने उस दिन जान लिया था। आप भी तो दादा होने पर मुझ से कही अधिक पुलकित थे। आपके दुलार- प्यार में ही कुक्कू घुटने चलता हुआ घर की सीढिय़ां चढऩे लगा था। आप उस पर नजर रखा करते थे। उसके लडख़ड़ाने या फिसलने से पहले ही आपका मजबूत हाथ उसे थामने को तैयार रहता था। घर के ऊपर माले पर उसके ताऊ थे और नीचे आप? पापा आपकी मौजूदगी मैं मुझे उसकी सुरक्षा की तनिक भी चिन्ता नहीं थी। आपका साया मुझे धूप में भी छांव का अहसास कराता था। कठिन वक्त में भी मुझे सहज बना देता था। मैं तो उन दिनों खुद स्वावलम्बन की डगर पर था। नव विवाहित जीवन की कई उतार-चढ़ाव वाली राह पर आप ही मेरा सम्बल बन जाया करते थे। हाथों में छोटी सी पगार पाकर मैं तो बैचेन हो जाता था। उस पगार में से एक चौथाई हिस्सा आपको घर खर्च का जो देना होता था। कई बार में संकोच कर बैठता था। आप भी मुझ से नाराज हो जाते थे पर मुंह से कहते कुछ नहीं। मैं ही आपके चेहरे से आपके मन के भाव पढ़ लिया करता था। मेरे ऐसे व्यवहार से आपको कितनी तकलीफ होती होगी ना पापा?
आज मैं ही नहीं तुम्हारी बहू भी कमाती है। मैं पूरी पगार मकान के कर्ज में चुका देता हूं। वो अपनी पगार से घर का खर्च उठाती है। अब तो आपका पोता ही नहीं पोती तनू भी चौदह बरस की हो गई है। चार की थी वो जब आप उसकी नन्हीं हथेली से धीरे से अपनी अंगुली छुड़ाकर उससे बहुत दूर आसमान का तारा बन बैठे थे। आपने तो उसका न हंसना सुना न नाचना देखा। अब तो वो नन्हें हाथों से मुलायम और पतली चपाती भी बनाने लगी है। दादी के हाथों अपने बालों में कंघी करवाते वो आपको याद कर लिया करती है। मेरे बच्चों की दादी ठीक से है पापा। पर वो मेरे बच्चों के पास नहीं रहती। उसका मन भी वहां लगता है जहां आपका पलंग लगा करता था। आपके सबसे छोटे को लेकर उसकी चिंता अभी मिटी नहीं जिसका घर बसाने की चिंता में आप मिट गए पापा। छोटे का ख्याल मुझे भी व्यथित करता है। पर मैं भी क्या करूं उसकी अधूरी शिक्षा और तंगहाली उसमें पनपने नहीं देती खुशहाली। आपकी दी छत के नीचे अभी वो महफूज है। आपको शायद याद न हो आपने जिस जमीन पर मेरे मकान की नींव रखी थी उसी छत के नीचे अब मेरा भी सुकून है पापा। पर अब न आप मेरे पास हो और न मैं मेरे परिवार के साथ? भाग्य का ये कैसा खेल है पापा?
पापा आपका ख्याल आते ही मेरा शरीर ऊर्जावान हो जाता है। अन्र्तमन गर्व और फख्र्र से खिल उठता है। आपके स्नेहिल स्पर्श का एहसास रोम-रोम में नवीन उष्मा का संचार कर देता है। ऐसा लगता है मानों आसमान की ऊंचाई और सागर की गहराई नापने की ताकत मुझमें आ गई। आज आप साक्षात मेरे पास नहीं तो क्या मेरे अन्तर्मन में तो बसे हो। एक संतान के लिए पिता का होना शब्दों में तो बांधा नहीं जा सकता। सिर्फ आत्मा की गहराई से महसूस किया जा सकता है। पिता ही तो होता है जिसका रिश्ता संतान की आत्मा और शरीर से होता है। पापा आप ही हो जिसने मुझे नाम दिया। समाज में पहचान दी। आप से ही मुझमें साहस और संस्कार पनपे हैं। आपने ही मुझे बुरे वक्त और बुरी नजर से बचाया है। रोटी के हर निवाले के साथ मेरी खुशहाली की दुआएं की हैं ईश्वर से मेरी कामयाबी की ऊंचाईयां मांगी हैं। आपने ही पढ़ाया है मुझे भलाई का पाठ। अच्छाई और बुराई में फर्क बतलाया है। आप से ही हुआ था मुझे सही और गलत का ज्ञान। भले और बुरे की पहचान। मैं आपको मिस कर रहा हूं पापा?
घर और परिवार से दूर आज जब मैं अकेला हूं मुझे आपकी जरूरत महसूस होती है पापा। सोचता हूं आप होते इन हालातों में मेरा सम्बल होते। मुझे याद है आपकी खु्रली सोच और दूरदृष्टि ही थी जब आपकी बहू की नौकरी लगी और आपने उसको अपने आशीर्वाद और सीख के साथ खुशी-खुशी विदा किया। वो जब अपने स्कूटर पर ऑफिस जाने लगी तो आपने उससे आपका पर्दा करना भी छुड़वा दिया। आप ही थे जो मुझसे कहा करते थे कि बेटा कोई नौकरी के लिए मेहनत कर लो या ये पत्रकारिता ही करोगे? काश मैंने तब आपका कहा सुना होता पापा? मेरा मन पत्रकारिता में ही लगा था। भले ही आज मैंने अपने लक्ष्य को पा लिया पर मन का संतोष अब भी न पा सका पापा। आज आपको याद कर आपके हृदय की विशालता को नमन करता हूं पापा।
मैंने तो आपको कभी जवान देखा ही नहीं पापा? मैं आपकी नौ संतानों में आठवां जो था। मेरा एक भाई रहा नहीं सो मैं सातवां हुआ। आपकी जो छवि मेरी आंखों में बसी है वह एक कर्मठ, संयमी, धैर्यवान, स्वाभिमानी, धीर-गंभीर और जीवन से संघर्षशील किसी उम्रदराज पुुरुषार्थी इंसान की सी है। आपका घर के काम-काज में व्यस्त एकाकी स्वभाव ही मेरे मानस पटल पर बरबस उभर आता है। सुबह दूध लाने से लेकर रात सोने के लिए हम सबके बिस्तर लगाकर घर के दरवाजे पर ताला जड़ आंगन की बत्ती बुझाने तक आपकी सक्रियता मेरी आंखों में आज भी किसी डॉक्यूमेंटरी फिल्म की तरह चलती है। सुबह जल्दी उठना और पैदल ही दफ्तर के लिए निकल जाना भी मुझे याद है। शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर लौटना और लौटते में हम बच्चों के लिए फल लाना नहीं भूलना भी मेरे जेहन में है। रात हमारी पढ़ाई के बारे में जानना और हमें पढऩे के लिए प्रेरित करना भी मैं नहीं भूला हूं। क्या मैंने पढ़ाई के लिए आपको कभी सताया था पापा?
आज जब मैं आपके पोते को समझाता हूं उसे उसका अच्छा कॅरियर बनाने के लिए प्रेरित करता हूं, उसे अपने शरीर की स्वस्थता के लिए समझाता हूं, उसे कम्प्यूटर के सदुपयोग के लिए कहता हूं, टीवी पर समय जाया करने से टोकता हूं, सम्भलकर और सुरक्षित वाहन चलाने के लिए बोलता हूं, पढ़ाई करते हुए लिख-लिख कर अभ्यास करने की सलाह देता हूं तो आप बहुत याद आते हो पापा। तब न अपना घर था, खेल के संसाधन, टीवी था न ही घर में कोई दुपहिया या चौपहिया वाहन, दो कमरे और दस हम परिवारजन। काम-काज के साथ तमाम साधन-संसाधनों के अभाव में परिवार के साथ इतना संतुलन कैसे बैठा लेते थे पापा? पापा आपको शत्-शत् नमन।

Sunday, April 18, 2010

अपनों ने ही बना दी पराई

किस्से और कहानियां बनी पेयजल उपलब्धता,
आगामी सरकारी योजनाएं खटाई में पडऩे के आसार
सन्तोष गुप्ता/विश्वनाथ सैनी
चूरू, 18 अप्रेल। लोगों ने घरों में घड़े भरकर रखना बंद कर दिया था। गृहिणियां रात सुकून से सोने लगी थी। अल सुबह उठने और मीलों पैदल चलने व सिर पर घड़े रख पानी लाने की चिंता उन्हें सताती नहीं थी। मेहमान के आने पर बच्चे दौड़कर सीधे टूटी से गिलास में ही ताजा पानी भर ले आते थे। रात को दो बजे भी पानी की जरूरत होती तो टूटी खोलते ही पानी उपलब्ध हो जाता था। मवेशियों की खेळियां और परिंदों के परिण्डे तक दिन भर भरे रहते थे। गांव के लोग पानी का मूल्य समझने लगे थे। नल से
पानी व्यर्थ बहते कोई देख लेता था तो तुरन्त टोक देता था या खुद टूटी बंद कर देता था। चौबीस घंटे पीने के लिए शीतल, शुद्ध और स्वच्छ पानी की उपलब्धता बनी रहती थी। ये बाते भले ही अब किस्से और कहानी सी लगती हों लेकिन यह सच्चाई है जो अब चूरू, झुंझुनूं और हनुमानगढ़ वासियों की जुबान से किस्से और कहानी बनकर निकल रही है। समय का चक्का तो अपनी गति से चलता रहा। गांव के लोग उसकी चाल के साथ कदमताल नहीं कर सके। वह तो न चाल समझ सके न चरित्र जान सके। पीने के पानी के अभाव में जीते हुए उसे एकाएक जो सुकून मिला वह उसे भी संजोए नहीं रख सके। खुशी मिले उन्हें बमुश्किल एक दशक भी नहीं बीता अपनों के बीच ही अपनों के ही हाथों आपणी योजना पराई होती दिखी।
राजस्थान पत्रिका की टीम ने दम तोडऩे के कगार पर पहुंची आपणी योजना का हाल जाना तो हैरानी हुई। सिर्फ सात साल पुरानी योजना को समय के साथ सम्बल और समृद्धता मिलने के बजाय जिसने जब चाहा जहां मौका मिला पराई नार की तरह बुरीनजर डालने से बाज नहीं आया। अब ढाणी और गुवाड़ में लगी टूटी दिनभर खुली रहती है पर उसमें पानी की बूंद नहीं टपकती। पाइप से गांव तक पीने का पानी महीनेभर में आए कि पन्द्रह दिन में कुछ निश्चित नहीं रहा। महिलाओं की दिनचर्या प्रभावित हो गई। चौका-चूल्हे से पहले पीने के पानी की जुगाड़ में उनकी रातों की नींद उड़ गई और दिन का चेन जाता रहा। पानी का इन्तजार करना तो अब ग्रामीणों के बस में रहा ही नहीं सो हर कोई पानी के जुगाड़ में फिर सेे जुटा दिखा। पत्रिका टीम ने पाया कि इन्दिरा गांधी नहर से पानी छोड़े जानेसे लेकर गांवों में पानी पहुंचने के बीच की तमाम व्यवस्थाएं पानी संग्रहण, भण्डारण, शुद्धिकरण और वितरण नियत मानदण्डों पर कहीं खरी नहीं उतर रही। न तो पानी का संग्रहण अपेक्षित है न भण्डारण सुरक्षित और संरक्षित है। शुद्धिकरण और स्वच्छता तो भगवान भरोसे है। वितरण व्यवस्था उन्हीं लोगों ने चौपट कर रखी है जिन्हें उसकी चौकीदारी का जिम्मा सौंपा था। चूरू, झुंझुनूं और हनुमानगढ़ के सैकड़ों ग्रामीण और कुछ शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए बनी जनसहभागिता के मूल आधार वाली पीने के पानी की इस योजना का इस तरह गला ही सूख जाएगा ऐसा तो योजना बनाने वाले ने भी कल्पना नहीं की होगी। हालात यह हैं कि आपणी योजना का वर्तमान ही नहीं उससे जुड़ी भविष्य की उज्जवल संभावनाएं भी पूरी क्षीण होती दिखाई देने लगी हैं।
राज्य सरकार तो चूरू की आपणी योजना को दिखा विश्व बैंक से इसे राज्य के अन्य जिलों में लागू करने का सुखद सपना देख रही है। जबकि स्थिति यह है कि योजना निकट भविष्य में चूरू में ही ठीक से संचालित हो सके इसमें संशय है। खुद जलदाय विभाग के अधिकारियों का दावा है कि कि जिन क्षेत्रों में योजना के जरिए पाइप लाइन से जलापूर्ति की जा रही है वहां इतने अवैध कनेक्शन है कि योजना का उस उपभोक्ता को लाभ दे पाना ही मुश्किल हो गया है जो कि सद्इच्छा से लाभ चाहता है।
मोटे अनुमान के अनुसार योजना से जुड़े गांवों में करीब तीस से चालीस हजार अवैध कनेक्शन हैं। यह सब कैसे हुए? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? यदि इन सबकी जांच और झंझटों में उलझा न भी जाए तो कम से कम अब इस पर तो ठोस कदम उठाने की जरूरत है ही कि अवैध कनेक्शनों को काटा कैसे जाए? फिर यह कि योजना से जुड़े अंतिम छोर के व्यक्ति और गांव तक पानी पाइप के जरिए कैसे पहुंचाया जाए? यह सच्चाई है कि योजना की पाइप लाइन में नियमित पानी प्रवाह नहीं बने रहने से उसके जोड़ों में लगी रिंगों को दीमक चट कर जाती है। इससे स्थिति यह हो गई है एक किलो मीटर के रास्ते में बीसियों जगह रिसाव हो गए।
अब भला पानी भेजने वाले और पानी पाने वाले सबकी नीयत साफ भी हो तो आखिर तक पानी पहुंचने की स्थिति ही नहीं बनती। पम्प हाउस से निकलने वाला पानी गांव की टंकी तक पूरा पहुंचता ही नहीं तो गुवाड़ी में लगी टूटी से पानी टपकेगा कैसे? योजना को संचालित करने वाले जलदाय महकमें के कारिंदें ग्रामीणों को कहते हैं कि वे पूरा पानी भेज रहे हैं गांव में जिन लोगों ने अवैध कनेक्शन किए हैं उन्हें काट दे तो पाइप में पानी आ जाएगा। ग्रामीण कहते है कि अवैध कनेक्शन काट दिए फिर भी पानी नहीं पहुंचा क्यों कि लाइन में पूरा पानी छोड़ा ही नहीं जाता। उनका आरोप है कि विभाग के लोग पानी माफिया से मिलकर पानी बेच रहे हैं। पानी पंचायतों और विभागीय अधिकारियों के बीच चलती इस नूरा कुश्ती ने स्थिति यह कर दी कि पम्प हाउस के नजदीक के गांवों में भी पाइप लाइन के जरिए एक माह में भी जलापूर्ति नहीं की जा रही। टैंकरों से जलापूर्ति में सबकी चांदी बन रही है और पाइप लाइन दीमक चट कर रही है। पत्रिका टीम ने देखा कि मौजूदा हालात में पानी नहीं पीकर भी ग्रामीण सुरक्षित रह सकता है पानी पीकर तो उसे जलजनित बीमारी घेर ले तो कोई बड़ी बात नहीं। आपणी योजना का पानी जिस स्त्रोत से और जिस वितरिका के माध्यम से जिन जगहों पर होता हुआ जिस हालत में पहुंच रहा है, वह शब्दों में बयां करना मुश्किल है। फिर उसे जिस तरह से स्वच्छ और शुद्ध किया जा रहा है यह इस बात से समझा जा सकता है कि पानी के ऑटोमेटिक ट्रीटमेंट प्लांट वर्षों से बंद पड़े हैं।
अनुभवी तकनीकी रसायन विशेषज्ञ प्लांट पर नियुक्त ही नहीं है। अनुमान के आधार पर हैल्परों से पानी की शुद्धता व स्वच्छता व्यवस्था बनाई रखी जा रही है। इन सब हालातों में जलदाय विभाग के आला से अदने अभियंता चाहे जो दावे व वादे करते हो इसमें कोई दोराय नहीं कि मौजूदा हाल और हालात अपेक्षानुकूल नहीं रहे। फिर भी अभी बहुत समय है। पानी की कीमत को जाना जाए और उसके उपयोग के प्रति जागा जाए। रिस-रिसकर व्यर्थ बहते पानी और ईंट-ईंटकर ढहते साधन-संसाधन को बचाया जाए। इस बार सिर्फ एक तरफा नहीं बल्कि चौतरफा समझ, संकल्प और समर्पण की जरूरत होगी।

फैक्ट फाइल
1994- शुरुआत
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2003- गांव-गांव पहुंचा पानी
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2 हजार किमी में- उच्चगुणवत्ता की पाइप लाइन
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20 हजार वर्ग किमी- क्षेत्रफल में फैली
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24 घंटे- जलापूर्ति का दावा
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485 गांव व 05 कस्बे- वर्तमान में जुड़े हैं
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20 गांव-सरदारशहर के जुड़े ही नहीं
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70 गांव- योजना से कटने को हैं तैयार
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09 लाख- लोग लाभान्वित
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04 स्थानों पर-जल शुद्धिकरण सयंत्र
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02 स्थानों पर- बड़े जल भंडारण गृह


योजना की मूल भावना
भ-जल की गुणवत्ता संबंधी समस्याओं से जूझ रहे चूरू, झुंझुनंू व हनुमानगढ़ जिले के लगभग बीस हजार वर्ग किलोमीटर में पीने के लिए नहर का शुद्ध व स्वच्छ पानी मुहैया करवाने की दृष्टि से वर्ष 1994 में आपणी योजना बनाई गई। मरु क्षेत्र में भागीरथी साबित हुई आपणी योजना में करोड़ों रुपए का वित्तभार संयुक्त रूप से जर्मन सरकार व राजस्थान सरकार ने वहन किया। योजना के प्रथम चरण में 370 गांव व दो शहरों के लगभग नौ लाख लोग लाभान्वित होने थे।
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निशचित रूप से आपणी योजना में ढेरों विकृतियां पैदा हो गई हैं। वर्षों पुरानी इस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। योजना की स्थिति दयनीय होने लिए ग्रामीण भी बराबर के जिम्मेदार हैं। प्रत्येक गांव में औसत ढाई सौ अवैध कनेक्शन हैं। सबसे अधिक समस्या राजगढ़ के गांवों में है। योजना के मूल स्वरूप को वापस लाने के लिए फिल्टर प्लांट, पाइप लाइन, साफ-सफाई, तीन सौ गांवों में मीटर बदलने तथा स्टाफ की कमी दूर करने के पांच सौ करोड़ रुपए के प्रस्ताव तैयार किए जा रहे हैं।
-श्रवण कुमार शर्मा, अधीक्षण अभियंता, आपणी योजना, चूरू


ना पूरा पानी, ना सफाई
घासला अगुना पम्प हाउस से जुड़े गांव भुम्भाड़ा में जलापूर्ति अनियमित है। पानी पंचायत भंग होने के कगार पर है। मेहलाणा, बास धेतरवाल व मेहलाणा दिखणादा व उत्तरादा में जलापूर्ति प्रभावित है। हौज के तल में खड्डा है, आधा पानी तो जमीन में ही समा जाता है। हौज की अर्से से सफाई ही नहीं हुई। पम्प का स्टाटर खराब पड़ा है। ब्लीचिंग पाउण्डर ही नहीं है। महलाणा के लोग पांच टंकियों पर कनेक्शन तथा घासला से रोजाणी बाइपास लाइन चाहते हैं।इसके लिए वे खाई खोदने को भी तैयार हैं।वर्तमान में योजना से झुंझुनूं व चूरू
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जिले के राजगढ़, तारानगर, चूरू, रतननगर व बिसाऊ कस्बा तथा करीब 485 गांव जुड़े हैं। योजना की अस्सी फीसदी दुर्गति अवैध कनेक्शनों के कारण हुई है। दस फीसदी व्यवस्थागत खामियां तथा दस फीसदी विभागीय लापरवाही भी जिम्मेदार है। योजना की सबसे बड़ी त्रास्दी यह है इसके शुरू होने के बाद से ही रख-रखाव पर कभी कोई बड़ी राशि खर्च नहीं की गई। इसे
बस चलाते गए। इसलिए वर्तमान में इस स्थिति का सामना करना पड़ा है।
-पीसी शर्मा, एक्सईएन, आपणी योजना, तारानगर
जारी...

Wednesday, April 14, 2010

पानी में आग बुझती कैसे?-

सन्तोष गुप्ता

भीषण गर्मी, सूखा और अकाल के हालत में चारा और पानी के लिए सड़कों पर उतरे ग्रामीणों की मंगलवार को जय-जयकार हो गई। ग्रामीणों की जय-जय होनी भी थी। चूरू में शायद यह पहला अवसर हो जब छत्तीस कौम और बिरादरी के लोग एक मुद्दे पर एक तम्बू के नीचे एक जाजम पर आकर बैठ गए हों। इसमें अहम बात यह थी कि वे मांगें माने जाने तक नहीं उठने के लिए एक साथ आकर बैठे थे। ग्रामीणों का नेतृत्व करने वाले तो उन्हें इतनी बड़ी संख्या में पहुंचने और पूरी दृढ़ता के साथ डटने का हौंसला देखकर ही सैल्यूट कर बैठे थे। प्रशासन को उनके जज्बे और जज्बात के आगे मजबूरन नतमस्तक होना पड़ा। अब रही शासन की बात तो उसके हाथ में कुछ रहा ही नहीं। दूर दराज के गांव और ढाणियों में बसे गरीब, दलित और किसान तक पीने का पानी और पशुओं को चारा मुहैया कराने की उसकी नैतिक जिम्मेदारी जो बनती थी। शासन इससे पीठ कैसे दिखा सकता था।

जबकि जनता ने कड़ी से कड़ी जोड़ दी। इसलिए ग्रामीणों ने इधर पड़ाव डाला उधर सरकार में हलचल हो गई। सरकार ने तुरन्त पानी महकमे के सचिव को उनसे बातचीत के लिए भेज दिया। वरना ऐसे धरने और अनशन राज्य के हर जिला मुख्यालय पर हर दिन होते रहते हैं। कई ऐसी घटनाएं सुर्खियों में आई हैं जब जनता ने पानी के लिए आनाकानी करने पर जलदाय विभाग के कारिंदों के साथ दो-दो हाथ कर लिए या फिर दफ्तर को घेर लिया। सरकार इनमें से कितने पर संवेदनशीलता और तत्परता बरतती है किसी से छुपा नहीं है। चूरू की बात कुछ ओर थी। पहला तो यह कि ग्रामीणों की मांग शत प्रतिशत जायज थी। दूसरा उनकी अगुवाई पर भले किसी पार्टी विशेष की मोहर लगी हो पर उनके आगे चलने वाले नेता जमीन से जुड़े, जनता के विश्वास पात्र और सशक्त प्रतिनिधित्व के धनी थे। शासन को ऐसे हालात में अपनी कमजोरी भांपने में देर नहीं लगी। फिर शासन यह भी जानता था कि पानी में आग लगी तो बुझेगी कैसे? इस चिंगारी को हवा लगी तो पूरा प्रदेश इसकी चपेट में आ जाएगा। सो शासन ने बिना किसी हीलहुज्जत के ठीक उसी तरह जलदाय विभाग के कारिंदों पर आंखें तरेरी जैसे कोई सास नईनवेली बहू को सबक सिखाने के लिए बेटी को फटकार लगाती है। ऐसा करने से हुआ यह कि जनता की भी जय और शासन -प्रशासन की भी जय। जबकि अन्दरखाने सब जानते हैं कि पानी न तो किसी फैक्ट्री में बनाया जा सकता है न ही उसे किसी गुप्त गोदाम में छिपाकर रखा जा सकता है। यदि कुछ किया जा सकता है तो उपलब्ध पानी का कुशल वितरण और सार्थक व किफायती उपयोग किया जा सकता है।

इस कमजोरी को न तो प्रशासन दूर करना चाहता है न जनता इस कमजोरी पर जीत दर्ज करने को गम्भीर नजर आती है। प्यास लगने पर कुआं खोदने की पड़ चुकी आदत आखिर जाते से ही जाएगी। विभागीय कारिंदों ने समय रहते प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजे होते तो हाहाकार नहीं मचता। अब स्थिति यह है कि जो काम उन्हें छह माह पहले कर लेना था वह काम वे छह दिन कैसे करेंगे यह देखने की बात

Thursday, March 18, 2010

इतनी हिम्मत कहां से जुटाई

सन्तोष गुप्ता
कम्प्यूटर की स्क्रीन पर सरदारशहर के संवाददाता का पोस्ट किया समाचार पढ़ा मन बैचेन हो गया। पति के वियोग में तीन बच्चों की मां ने आत्मदाह जो कर लिया था। तीस वर्षीय जवान महिला का इस कदर जिंदा मौत को गले लगाना मेरी समझ से परे था। दिमाग के सारे दरवाजे जैसे झनझना उठे। आखिर उसने इतनी हिम्मत कहां से जुटाई होगी? कुछ दिन पहले ही समाचार मिला था एक प्रेमी युगल कीटनाशक पीकर दुनिया छोड़ चला। नफरत भरी दुनिया में प्यार करने का जोखिम उठाने वाले ये जिंदादिल इंसान भीतर से कितने कमजोर थे इसका पता उनके अलविदा होने पर चला। आर्थिक तंगी, शारीरिक लाचारी और लाइलाज बीमारी में मौत की साधना करने वालों के समाचार चूरू में आए दिन मिलते रहते हैं। हर बार मन इतना व्यथित हो जाता है कि फिर किसी काम में जी लगाना मुश्किल हो जाता है।
सोचता हूं आखिर ऐसा क्यूं हैं? विचार करता हूं तो पाता हूं कि जिस शहर में वार्डों की सीमा समाप्त होते ही पानी का स्वाद बदल जाता हो, जिव्हा नमकीन हो जाती हो। जिस शहर की फिज़ा में खुशबू की जगह दुर्गन्ध बसती हो। जहां सुबह चहचहाती चिडिय़ाओं और कहकहे लगाते तोतों या फिर गुटरगूं करते कबूतरों की आवाज कानों में मीठा रस घोलने के बजाय, रेत के धोरों में नजर गड़ाए दूर आकाश में उड़ती चील की कर्कस चित्कार सुनाई पड़ती हो। जहां शाम पड़े सूरज अस्त होते ही दिनभर की जीतोड़ मजूरी में थका बैशाखनन्दन का कराहना बरबर कानों में गूंजता हो। वहां ऐसा होना अनूठी बात नहीं लगती।
जिस शहर की गली-मोहल्लों में सैकड़ों खिड़कियों और झरोखों वाली बंद पड़ी पुरानी हवेलियां हर राहगीर को आते-जाते दिन में बीसियों बार दिखाई देती हो। यहां के खेत और खलियानों में या शेष रहे उद्यानों में भी हरियाली और ताजी हवा के झोंके निषेध हो चले हों वहां के लोगों की जिंदगी में जीवंतता एवं सोच और विचार में ताजगी की कल्पना कहा से की जा सकती है।
जो जहां पड़ा उसे पड़ा रहने दो जैसा चल रहा है वैसा चलने दो वाले जुमलों को गुनगुनाते लोगों को क्या पड़ी है कि जरा भी विचारे कि अब कुछ नया अपनाने का समय आ गया है। पेंशनरों सी जिंदगी जीते लोगों ने तो शाम पड़े बकरियों को खूंटे से बांधने और मुर्गे-मुर्गियों को पिंजरे में धकलने के बाद गली में कब्जाई जमीन पर चारपाई डालकर सुस्ताने को ही जिंदगी मान ली है। उन्हें तो पैर और पेट के दर्द से कराहते बैशाखीनन्दन का भरपेट खाने के लिए मालिक से चीखचीख कर गुहार लगाना भी हेरिटेज सोंग सा लगता है। डीजे पर दस हजार वाट के स्पीकरों से निकलता साउण्ड भी उन्हें मधुर शास्त्रीय संगीत सा सुनाई पड़ता है।
पति के न रहते तीन बच्चों का पेट पालना, पापी पेट की आग बुझाने के लिए बदन भेदती बदनीयत नजरों का सामना करना, खुदगर्ज समाज की जहर घुली बातों से बच्चों को दूर रख पाना, मतलबी रिश्तेदार के नित मिलते तानों को सह पाना शायद उसे मौत से ज्यादा मुश्किल लगा हो। रोटी के ईंधन और सोने के लिए बंद आंगन का तो उसने जुगाड़ कर लिया था। किसी के आगे झोली नहीं फैलाने का स्वाभिमान भी उसमें था। नहीं तो वह अपने दस साल के बच्चे से मजूरी नहीं कराती खुद पापड़ और मंगोड़ी नहीं बनाती। जिंदगी के चकले पर पेट की आग में सिक कर पापड़ की सी पपड़ाती उसकी भावनाओं और संवेदनाओं का रुदन काश समाज के किसी झण्डावरदारों ने सुन लिया होता।