दोस्तों, आज मैं खुश हूं। यह खुशी आपसे मुलाकात की है। इस मुलाकात के लिए मैं पिछले लम्बे समय से चाहत रख रहा था। चाहत अब से चंद सैकंड पहले ही पूरी हुई। अगले हर पल आप लोगों का सुखद सान्निध्य पाता रहूं ऐसी कामना है। मैं चाहता हूं कि मैंने अब तक जो किया, जो मैं कर रहा हूं और जो मैं करना चाहता हूं। उसे ब्लॉग के जरिए आप सभी से साझा कर सकूं। मुझ में हर नए दिन की शुरुआत के साथ कुछ नया करने की ललक रहती है। उसे शिद्दत से पूरा करने की जद्दोजहद में हर दिन करना होता है...सच का सामना। ये ब्लॉग ऐसी ही सच्चाइयों से अब आपकों भी कराता रहेगा रू-ब-रू।

Thursday, December 31, 2009

रिश्तों में ले आएं गरमाहट

इक्कीस वीं सदी के पहले दशक के अंतिम बरस का पहला दिन हमारी देहलीज पर आ खड़ा हुआ है। बीते पल और नए क्षण के बीच भला कभी कोई फासला रहा है? हर ढलती सांझ पर नई सुबह की इबारत लिखी होती है। हमें तो उसे पढऩा और ईश्वर के भेजे संदेश को समझना भर होता है। निरंतर बदलते समय की नजाकत को समझते हुए जो आगे बढ़ गया वही मंजिल पा गया। जो पिछड़ गया वह वहीं ठहरा रह गया। जीवन एक सफर ही तो है। सफर यानि गतिवान बने रहना। चलते रहना। पल-पल आगे बढ़ते रहना।

कुछ नया करते रहना।याददाश्त पर ज्यादा जोर ना भी दे तो भी याद आ जाता है जब हमने आज ही कि तरह वर्ष 1999 को अलविदा कहा था और वर्ष 2000 का गर्मजोशी से स्वागत किया था। नई सोच, नए इरादे, नया ख्याल और नवीन जज्बा हमारे दिलो-दिमाग में उमडऩे-घुमडऩे लगा था। सदी के पहले दशक के नए साल की शुरूआत नए लक्ष्य और संकल्प के साथ करने की चाहत जवां हो उठी थी। आज फिर वैसा ही अवसर है। वैसी ही महफिल सजी है। अपने आस-पास कमोवेश वैसा ही नहीं तो थोड़ा-बहुत बदला हुआ मंजर है। वैसा ही समां। थोड़ा गौर से देखें तुम्हें चाहने वाले यहां कितने हैं? कौन शेष है जो तुम्हारा शुभचिंतक है? किसे तुम दावे के साथ अपना कह सकते हो? कौन है जो तुम्हारा हाथ थाम कर दस कदम तुम्हारे साथ चलने को राजी है? कौन है जो तुम्हारी गलती पर मुस्कराता नहीं संबंल देता है? तुम्हारी उत्कृष्ट सेवाओं का खुद श्रेय नहीं लेता तुम्हे शाबासी देता है।

इक्कीसवीं सदी का यह दशक विकास के पथ पर निश्चित ही बहुत तेजी से आगे बढ़ गया। अदने से आला तक ने तरक्की पा ली। कई निरक्षर से साक्षर हो गए। जो कल तक नासमझ थे आज समझदार हो गए। अज्ञानियों ने ज्ञानवान होने का दर्जा पा लिया। जो दलवान थे वे धनवान हो गए। धनवान भी देखते - देखते बलवान हो गए। अब तक जो पैदल फिरा करता था वह कार वाला हो गया। कार वाला बड़े रसुकात वाला हो गया। पीछे छूटा तो बस छोटों को प्यार और बड़ों का सम्मान, दोस्तों की मोहब्बत और सहेलियों की प्रीत, रिश्तेदारों से अपनापन और पड़ोसियों से नजदीकियां, पारिवारिक सरोकार और सामाजिक सद्भाव, मातहतों से समभाव और प्रतिद्वंद्वियों से सौहार्द, गरीब के प्रति संवेदना और सेवा में वफादारी, पर्यावरण से जुड़ाव और जीवों से लगाव, माटी की खुशबू और रोटी की मिठास।

खैर, आज मौका भी है और अवसर भी सोचो और संकल्प करो कामकाज की व्यस्तता में भी अपनो को समय दे सको, बुजुर्गों पर अपनापन लुटा सको। पड़ोसियों से मधुरता निभा सको। रिश्तेदारों की नजदीकियां पा सको। अधिकारियों का विश्वास हासिल कर सको। मातहतो पर भरोसा कर सको। नौकरी पर निष्ठा बहाल रख सको। दोस्तों से वफा कर सको। पानी को सहेजे रख सको। पर्यावरण से प्रीत कर सको। जीवों को प्यार दे सको। निर्बल को सम्बल और गरीब में संवेदना बांट सको। सोचो, कुछ ऐसा कर सको कि रिश्तों में फिर से गरमाहट भर सको। नया साल मंगलमय हो।

Tuesday, December 29, 2009

कैसे हो इकबाल बुलन्द

जिले में बुलन्द होते अपराधियों के हौंसले और कमजोर होता पुलिस का इकबाल आमजन को बेचैन बनाए हुए है। अपराधियों की सरेआम दहशतगर्दी की एक नहीं अनेक वारदातें हाल में घटित हुई हैं। पुलिसिया तंत्र है कि उसमें कहीं कोई हलचल दिखाई नहीं देती। पुलिसिया वर्दी का रंग आचरण में घुसी घूसखोरी में फीका पड़ गया है। रुआब तो जैसे अब रहा ही नहीं। पुलिसिया डण्डे को मानवाधिकार का लकवा मार चुका है। खुफियातंत्र दूर संचार क्रांति के ज्वर से संक्रमित है। शेष रहा क्या? निगरानी व्यवस्था? उसे पुलिस थाने और चौकियों की नफरी मार गई। अब बचा पुलिसिया इकबाल! उसका निगोड़ी राजनीति ने टेटुआ दबा रखा है। ऐसे में आमजन में विश्वास और अपराधियों में डर जैसे पुलिस के ध्येय वाक्य की अहमियत ही खत्म हो गई।आमजन भयभीत और समाजकंटक संरक्षित नजर आने लगे हैं। बच्चे से बूढ़े तक बेटी से दादी तक ने जान-माल की सुरक्षा और संरक्षा खुद के बूते या फिर भगवान भरोसे छोड़ दी है। सोमवार को जिले का सादुलपुर कस्बा एक बार फिर सुर्खियों में आया। न्यांगली और संजय नायक हत्या काण्ड की फाइल अभी पूरी तरह बंद नहीं हुई कि एक कारोबारी के गोली मारकर सरेराह ढाई लाख रुपए लूट की घटना ने हर आम और खास को हैरत में डाल दिया। पुलिस ने तो अभी घटना की ठीक से जांच ही शुरू नहीं की थी कि लुटरों को पहचानने वाले को टेलीफोन पर मिली जान से मारने की धमकियों ने इतना दहशत में ला दिया कि उसने मंगलवार सुबह खुदकुशी कर ली। अठारह वर्षीय इस नवयुवक ने अपनी जान को जोखिम में मानकर पुलिस से सुरक्षा की गुहार भी की थी। यहां चौंकाने वाली बात यह है कि घटना के कुछ समय बाद ही नवयुवक के पुलिस थाने पहुंचने की सूचना लुटेरों को कैसे मिली? क्या पुलिस थाने में अथवा बाहर लुटेरों के गुर्गे निगरानी रखे हुए थे? यदि यह सही है तो और भी अधिक गंभीर बात है। यहां सवाल यह भी उठता है कि जब युवक ने उसे फोन पर मिल रही धमकियों की जानकारी पुलिस को दी थी तो पुलिस ने उसे ही सुरक्षा घेरे में क्यों नहीं लिया? गोलियां चलाकर भागने वाले लुटरों से युवक की हिफाजत में घर पर निहत्थे सिपाहियों की तैनातगी के क्या मायने थे? अब तक यह बात भी स्पष्ट हो चुकी थी कि लुटेरों में से एक को वह पहचानता था। क्या हाथ आए गवाह को सुरक्षा मुहैया कराना पुलिस का धर्म और दायित्व नहीं था? जो भी हो पुलिसिंग में रही कमजोरी किसी न किसी रूप में इस हादसे के लिए जवाबदेह तो है ही। पुलिस प्रशासन को चाहिए कि वह सीएलजी की कथित खानापूर्ति वाली बैठकों से ऊपर उठकर आमजन में पुलिस का विश्वास कायम करने के लिए विचार करे। साथ ही समाजकंटकों के आगे कमजोर होते पुलिसिया इकबाल को बुलंद रखने के लिए ठोस कदम उठाए। अन्यथा खुद की सुरक्षा में लोग लामबंद होने लगे तो शांति व कानून व्यवस्था बनाए रखने में बड़ी मुश्किल होगी।

Thursday, December 24, 2009

कौन भुगतेगा खामियाजा

सन्तोष गुप्ता

नैतिक और सामाजिक मूल्यों ने निरंतर आ रही गिरावट आखिर कहां जाकर थमेगी यह विचार अब लाजिमी हो गया है। शिक्षा जैसे पवित्र पेशे में नैतिक मूल्यों क हृास समाज के हर व्यक्ति के लिए चिंतनीय है। दो दिन पहले दसवीं कक्षा की अद्र्धवार्षिक परीक्षा का गणित का परचा आउट होने की खबर कानोंकान शहर में तैर रही थी। शिक्षा विभाग के आला से अदना अधिकारी ने इस पर कान नहीं धरे। समाचार पत्रों में इससे संबंधित समाचार सुर्खियों में साया हुए परन्तु शिक्षा अधिकारियों ने इस पर भी गौर नहीं किया। मामला चूंकि दसवीं की अद्र्धवार्षिक परीक्षा का था इसलिए संभवतया शिक्षा अधिकारियों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इसके पीछे तर्क यह हो सकता है कि इस परीक्षा से परीक्षार्थी के सालाना परिणाम पर कोई असर नहीं होना था। परीक्षार्थियों को भी सिर्फ बोर्डपरीक्षा परिणाम से मतलब है इसलिए न अध्ययनरत परीक्षार्थी बोले न ही उनके अभिभावकों ने भंग हुई गोपनीयता के विरुद्ध मुंह खोला। बुधवार कक्षा नौ के गणित द्वितीय का प्रश्न पत्र लीक होने की चर्चा सुबह नौ बजे से जंगल में आग की तरह शहर में फैली। जिरोक्स की दुकानों व स्टेशनरी के व्यापारियों ने तो आवाज लगा कर बीस रुपए प्रति कॉपी की दर से सैकड़ों विद्यार्थियों को प्रश्न पत्र बेच डाले। इस हालत को देखकर जागरूक नागरिक का जमीर जाग गया। नैतिकता के पतन की हद उसे देखी नहीं गई। उसने पत्रिका को फोन पर इसकी सूचना ही नहीं दी सुबह पौने दस बजे तक प्रश्न पत्र की एक जिरोक्स प्रति पत्रिका कार्यालय पर भी पहुंचा दी। अब यह जांच का विषय हो सकता है कि प्रश्न पत्र लीक कहां से हुआ? किसने, किस लालच में गोपनीयता भंग की? शासन-प्रशासन उसे सजा भी दे देगा। पर सवाल यह उठता है कि इसका खामियाजा भुगतेगा कौन? उन विद्यार्थियों के समय और श्रम की क्या कीमत होगी जिन्होंने दिनरात एक कर मेहनत की और परीक्षा दी। उनके अभिभावकों ने जाड़े के दिनों में रातों की नींद और दिन का सुकून ताक पर रखकर बच्चों को पढ़ाया। घर खर्च में कटौती कर उन्हें ट्यूटोरियल कक्षाओं में भेजा। नतीजा क्या रहा? चंद अवसरवादी विद्यार्थियों अथवा एक दो समाजकंटकों के कारण समान परीक्षा से जुड़े करीब छह सौ विद्यालयों के दो लाख से अधिक बच्चों की मेहनत पर पानी फिर गया। परीक्षा जैसे मामले में गोपनीयता बरती जाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। यह जिम्मेदारी प्रश्न पत्र बनाने वाले शिक्षक से शुरू होकर उसके मुद्रित होने, वितरण के लिए लिफाफा बंद होने तथा परीक्षा केन्द्र तक सुरक्षित पहुंचने तक उसे छूने वाले उन सभी हाथों की है जो व्यक्ति उससे जुड़ा है। इसमें से किसी भी स्तर पर रही मामूली त्रुटि समय, श्रम और धन की बर्बादी का कारण बन जाती है। पहले भी ऐसी ही घटनाएं हुई हैं। प्रश्न पत्र आउट करने वाले पकड़े गए, सजा भी हुई पर घटना की पुनरावृति नहीं रुकी? सोचा यह जाना है कि क्या दो लाख बच्चों की परीक्षा दोबारा कराना ही इसका एक मात्र विकल्प और हल हो सकता? इसमें पढऩे वाले मेहनत करने वाले बच्चों का दोष क्या है? खता कोई करे सजा कोई भुगते क्या इसे न्याय संगत कहा जा सकता? परचा आउट करने वाले, कराने वाले और बेचने वाले सभी को शीघ्र बेनकाब कर इस समाजिक अपराध की सख्त से सख्त सजा निर्धारित तो होनी ही चाहिए। विद्यार्थियों के हित में किसी और विकल्प पर भी विचार होना चाहिए जिससे समय, श्रम और धन की बबार्दी से बचा जा सके।santosh.gupta@epatrika.com

Wednesday, December 23, 2009

जनअपेक्षाओं पर कुठाराघात

सन्तोष गुप्ता

नगरपरिषद पर काबिज कांग्रेस बोर्ड की पहली साधारण सभा की बैठक में मंगलवार को जो हुआ उस पर शहरवासियों को अफसोस है। जनता की उम्मीद और अपेक्षाओं पर तो जैसे कड़ाके की ठंड में घड़ों पानी पड़ गया। साधारण सभा में जनप्रतिनिधियों का व्यवहार किसी भी दृष्टि से शोभनीय नहीं रहा। शिष्टाचार और संजीदगी की तो जैसे चिंदी-चिंदी होकर रह गई। अनुशासन की धज्जियां उड़ गई। सदन की गरिमा का रत्तीभर भी ख्याल नहीं रखा गया। सभापति के सीधे निर्वाचन और आधी दुनिया को आधा हक दिए जाने के बाद यह माना जा रहा था कि अब सदन में शांति और शालीनता का बोलबाला रहेगा। महिला जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी सदन में पुरुष सदस्यों के व्यवहार को मर्यादित, संजीदा और संस्कारिक बनाएगी। जनप्रतिनिधि चाहे वह पक्ष का हो या विपक्ष का शहर हित में त्वरित निर्णय करने में साझा समझ का परिचय देंगे। शहरी विकास और सौंदर्यीकरण की योजनाओं के क्रियान्वयन में किसी तरह की अड़चन नहीं होगी। मंगलवार को आहूत साधारण सभा में जो हुआ वह जनअपेक्षाओं के विपरीत ही रहा। जनप्रतिनिधियों में एक दूसरे के विरुद्ध तू-तड़ाक से वार्तालाप हुआ। महिला जनप्रतिनिधियों के साथ धक्का-मुक्की की गई। कुर्सियां उठाकर फेंकने की कोशिश हुई। इतना ही नहीं किसी प्राथमिक स्कूल के बच्चों की तरह जनप्रतिनिधि मेजों पर चढ़कर चीखे-चिल्लाए। अधिकारी के हाथ से दस्तावेज छीन कर फाड़ दिए गए। सदन में बेहूदगी की हद तो तब पार हुई जब धक्का-मुक्की के बीच ही महिला जनप्रतिनिधियों के साथ अभद्रता कर दी गई। महिला जनप्रतिनिधियों का जिला कलक्टर से मुलाकात कर उनके साथ हुई अभद्रता की शिकायत करना अत्यंत गम्भीर चिंता और चिंतन की बात है। यहां यह भी विचारणीय है कि जनता के अकूत मत और अटूट विश्वास के बूते चुने सदन में ऐसी नौबत ही क्यों आई? इसे सदन चलाने वालों की अपरिपक्वता कहें या सांगठनिक कमजोरी। होना तो यह चाहिए था कि सदन में नवनिर्वाचित सभापति साधारण सभा की बैठक बुलाने से पहले पक्ष और विपक्ष के प्रतिनिधियों को विश्वास में लेकर साझा प्रस्ताव तैयार करते। सदन में शहरी विकास को लेकर वे अपना पांच साला दृष्टिकोण रखते। नगरपरिषद की माली हालत से सदन को अवगत कराया जाता और आय बढ़ाने के लिए चुने गए प्रतिनिधियों से ही सुझाव लिए जाते। परिषद के साधन-संसाधन बढ़ाने और शहरी समस्याओं को प्राथमिकता से निस्तारित करने की रूपरेखा तैयार की जाती। पहली साधारण सभा के एजेण्डे में विवादित प्रस्तावों का रखा जाना राजनीतिक सूझबूझ की कमी को ही नहीं परिषद में पदस्थापित प्रशासनिक कारिंदों की निष्पक्ष बुद्धिमता पर भी सवाल खड़े करने वाली है। बहरहाल, अभी तो शुरुआत है, सदन में हुई गलतियों से सबक लिया जाए तो अगली बैठकों में शहरवासियों का हित साधा जा सकता है।

santosh.gupta@epatrika.com

Tuesday, December 22, 2009

कायम हो वर्दी का विश्वास

भीलवाड़ा। बहुत पुरानी कहावत है पहले मारे सो मीर। मतलब यह कि सामने वाले के चक्षु खुलने तक हाका कर पूरे गांव को अपने पक्ष में कर लेने वाला ही होशियार। बेगूं के विधायक राजेन्द्रसिंह विधूड़ी को राह चलते दो सौ रुपए की सेवा बताने की घटना ने सबकी आंखें खोल दी। परिवहन महकमे के आला से लेकर अदने से अफसर ने भरे चौराहे शर्र्मिंदगी महसूस की। खाकी वर्दी का रंग और रुआब तो एसीबी के पाउडर लगे नोट की तरह धुलकर उतर गया। वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर वसूली के लक्ष्य पूरे करने को लेकर महकमे की कार्य व्यवस्था लडख़ड़ा गई। महकमे पर यह ऐसा हमला था जैसे किले की पहरेदारी में चौकस सिपाहियों पर रात के तीसरे पहर दुश्मन ने हमला बोल दिया। ऊनींदा सिपाही अपने को संभालते जब तक पहरेदारी में कोताही की राजा को खबर हो गई। अब भला सिपाहियों की दलील कौन सुने? सो परिवहन महकमे का उपनिरीक्षक अब चिल्ला-चिल्लाकर भी कहे कि वह निर्दोष है तो उसकी कौन माने? चलिए यदि कोई अब उसकी बात मानने को तैयार नहीं तो न हो, उसे अनसुना भी नहीं किया जा सकता है? यदि वह यह कहना चाहता है कि जहां से धुआं निकल रहा है वहां ऐसे आग लगी थी तो उसमें हर्ज क्या है?

आखिर उसकी बात में सच्चाई होगी तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।कौन नहीं जानता राजनीति के हीरो विलेन के हाथों शिकस्त खा भी जाएं तो अपने धनबल-भुजबल और छल-बल से फिर प्रभाव जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उपनिरीक्षक का कहा सच मानें तो लोकसेवक के सुरक्षा गार्ड ने राजकीय कामकाज कर रहे राजकीय कर्मचारी पर पहले तो अमानुषी हमला किया और फिर स्वयं की पहचान छिपाते हुए अपकथन कहे। हद तो तब हो गई जब लोकतंत्र के प्रहरी ही राजकीय सेवक को उठा ले गए। मामला उलटा पड़ता नजर आया तो लोगों को बुलाकर उनकी आंखों के सामने ऐसा ड्रामा रचा कि खाकी वर्दी का रंग सड़क की तरह काला पड़ गया।

यहां समझने वाली बात यह है कि लोकतंत्र में लोकसेवक और उसके सुरक्षा गार्ड को कानून हाथ में लेने के यह अधिकार दिए किसने? सड़क पर जाम लगना तो आम बात है। लोकसेवक थोड़ा संयम और धैर्य का परिचय देते तो अवरुद्ध मार्ग उनके लिए सुगम और सहज होते देर नहीं लगती। यूं भी सोचा जाए तो आलीशान गाड़ी में सुरक्षागार्ड के साथ बैठे किसी भद्र पुरुष से भला कौन मूर्ख सेवा करवा कर अपनी और महकमे की भद पिटवाएगा।

सत्य को कुछ समय के लिए झुठलाया जा सकता है मिटाया नहीं जा सकता। अब भले ही सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। परिवहन आयुक्त ने जांच भी शुरू कर दी है। जांच की सांच का खुलासा जब होगा तब होगा। तब तक परिवहन महकमा चौराहे पर शर्र्मिंदगी झेलता रहेगा। परिवहन महकमे को भी चाहिए कि वह अपनी कमजोरियों को भी जांचे। कामकाज में पारदर्शिता लाए। यदि उपनिरीक्षक का कहा सत्य पाया जाता है तो फिर बिना किसी दबाव के लोकसेवक और उसके फरमाबरदार के विरुद्ध भी वैसी ही विधिसम्मत कार्रवाई अमल में लाई जाए जिससे लोगों में वर्दी का विश्वास और रुआब बना रहे। -सन्तोष गुप्ता

इस मर्ज की क्या है दवा

भीलवाड़ा जिले के आसींद तहसील स्थित ग्राम संग्रामगढ़ निवासी भंवरलाल की छह माह की पुत्री ममता अब सिर्फ भंवरलाल की ही नहीं रही। वह हर उस शख्स की ममता पा गई जिसमें तनिक भी मानवीय संवेदना शेष है। जिसने भी ममता के लिए भंवरलाल को तड़पते देखा, ममता की मौत की खबर ने उसे रुला दिया। आधुनिक चिकित्सकीय सुविधाओं और श्रेष्ठतम चिकित्सकों की टीम होने के बावजूद खून की कमी से पीडि़त मासूम की जान न बचा पाना निसंदेह सभी के लिए अफसोसजनक रहा। महात्मा गांधी चिकित्सालय में जमा पचास-सौ लोगों की तो भृकुटियां तन गई। पर, कर कोई कुछ नहीं सका। इन चिकित्सालयी अव्यवस्थाओं से हर कोई रू-ब-रू हो रखा है, लेकिन हर एक ने अपनी हैसियत के अनुसार व्यवस्थाएं बना ली है।

गांव का भंवरलाल ही ऐसा अभागा रहा जो ममता की खातिर चिकित्सालयी माया को न समझ पाया। भंवरलाल की आंखों में आंसू झलझला उठे थे। चेहरा भावशून्य दिखाई दे रहा था। होठ तो जैसे किसी ने सिल दिए हों। उसके पास अब न कुछ कहने को बचा था और न कुछ सुनने को। राष्ठ्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर बने अस्पताल का हर दर-ओ-दीवार अब उसे बेमानी लगने लगे थे। यहां जमा लोग भले ही उससे हमदर्दी रखते हो पर उसके लिए वे सब तमाशबीन से ज्यादा नहीं थे।

उसने कोई जुआ नहीं खेला फिर भी यहां सब कुछ हार चुका था। दांव पर लगाने को तो उसके पास पहले ही कुछ नहीं था। एक अदद उम्मीद थी। जिसके भरोसे वह अपनी फूल सी नाजुक बच्ची को जिन्दगी के दो घूंट पिलाने की आस में दौड़ा चला आया था। चिकित्सालय के कागजी भंवरजाल में ऐसा उलझा कि उसकी आंखों का नूर कब आसमान का तारा बन उससे दूर हो गया उसे एहसास ही नहीं हो सका। भंवरलाल आंखें फाड़कर चिकित्सक के आने की ही बांट जोहता रहा और यमराज बिना आहट के उसकी ममता को छीन ले गया।

कहते हैं ईश्वर के बाद यदि धरती पर इंसान को किसी पर सहज भरोसा होता है तो वह चिकित्सक ही है। चिकित्सक को आज भी मान और इज्जत बख्शी जाती है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि माया के भंवरजाल में फंसे चिकित्सकीय पेशे में तो मानवीय संवेदनाएं कुपोषण के शिकार किसी दीन-हीन की गुम होती नब्ज की तरह टटोलने पर भी हाथ नहीं आ रही। कहीं कोई ठोस निगरानी नहीं है। कहीं मरीज की पर्ची पर कमीशन की दवाइयां लिखने के चर्चे आम हैं तो कहीं मरीज को वार्ड में भर्ती से पहले मुट्ठी गर्म करने का रिवाज हो गया है। रुई और पट्टी से लेकर रोग प्रतिरोधक और जीवनरक्षक दवाओं का अभाव गांव की डिस्पेंसरी से लेकर बड्े चिकित्सालयों तक है। यही कारण है कि कथित चिकित्सकीय अनदेखी और लापरवाही को लेकर चिकित्सालयों में हंगामे और तोडफ़ोड़ के किस्से हर रोज सुनने को मिल रहे हैं। पर इस मर्ज की दवा नहीं मिल रही।

महात्मागांधी चिकित्सालय को ही ले तो गत वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि यहां शिशु मृत्यु दर सालाना दस प्रतिशत से अधिक है। यह दर राष्ट्रीय शिशु मृत्युदर की तुलना में दुगनी है। राष्ट्रीय शिशु मृत्युदर 5.7 प्रतिशत है। यहां यह तथ्य भी चौंकाने वाला है कि मरने वाले बच्चों में 20 फीसदी जन्म के साथ ही श्वास की तकलीफ व 12 प्रतिशत खून की कमी से मौत का निवाला बन जाते है। चिकित्सकों की राय में खून की कमी से पीडि़त बच्चों को तो रोग प्रतिरोधक दवाएं देकर बचाया जा सकता है। श्वास से पीडि़त बच्चों के लिए तो सिर्फ शिशु रोग चिकित्सक की सतर्कता ही काफी है। बावजूद महात्मागांधी चिकित्सालय में इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा। चिकित्सालय प्रबन्धन और स्वयं चिकित्सक संकल्पित हो जाएं तो फिर किसी की ममता यूं रोगोपचार के अभाव में आंसू नहीं बनेगी। ना ही कोई भंवर व्यवस्थाओं को न समझने पर तमाशा बनेगी।

निर्दलियों ने बनाया मुकाबला रोचक

प्रमुख संगठन भितरघात के फ्लू से पीडि़त

मौजूदा तथा पूर्व विधायक की प्रतिष्ठा दांव पर

कुल मतदाता- 74 हजार 369

पुरुष मतदाता-39 हजार ४०१

महिला मतदाता-34 हजार 968

नए मतदाता-10 हजार ३८२

पिछला मतदान प्रतिशत-72

(नगर पालिका चुनाव)

चूरू, 22 नवम्बर। निर्दलियों की मौजूदगी ने चूरू नगरपरिषद सभापति का चुनाव त्रिकोणीय और रोचक बना दिया है। निर्दलियों को मिलने वाले मत प्रमुख पार्टी प्रत्याशियों के हार-जीत का अंतर तय करते दिखाई दे रहे हैं। मुख्य रूप से यहां कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी में कांटे की टक्कर है। कांग्रेस में जहां विधायक हाजी मकबूल मण्डेलिया की प्रतिष्ठा दांव पर है तो भाजपा में पूर्व मंत्री एवं तारानगर विधायक राजेन्द्र राठौड़ की पैठ। दोनों ही संगठन भितरघात के फ्लू से भी आशंकित है। यह बात दीगर है कि जहां कांग्रेस प्रत्याशी गोविन्द महणसरिया की जीत के लिए विधायक हाजी मकबूल मण्डेलिया और ऑल इण्डिया हैण्डीक्राफ्ट बोर्ड के उपाध्यक्ष रफीक मण्डेलिया ने दिन-रात एक कर दिए हैं। लेकिन प्रत्याशी के चयन में पार्टी के जुझारू कार्यकर्ताओं की उपेक्षा ने संगठन की एकजुटता में खटास ला दी है। वहीं भाजपा प्रत्याशी रमाकांत ओझा को जिताने में राजेन्द्र राठौड़ ने चूरू की गली-गली नाप दी है। लेकिन मतदाता है कि वह अपने मन की पाती किसी को पढऩे नहीं दे रहा। ऐसे हालात में चुनाव मैदान में ताल ठोक रहे निर्दलीय प्रत्याशी और कांग्रेस के बागी गौरीशंकर मण्डावेवाला, मोहम्मद असलम खान, सलीम गुर्जर, संतकुमार सारस्वत, कैलाश चंद्र तथा सीपीएम के रमजान खान को मिलने वाले मत और दोनों ही प्रमुख पार्टियों में संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं की सोमवार को मतदान के दिन सक्रियता ही प्रत्याशियों की दिशा और पार्टी की दशा तय

क्या कहता है अतीत

चूरूवासियों ने स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार सन 1971 से लेकर 1992 तक करीब बीस साल चूरू में नगर परिषद हुआ करती थी। आबादी का सीमांकन बढऩे से चूरू परिषद का दर्जा घट गया। सन् 2008 अक्टूबर तक चूरू में नगरपालिका बोर्ड रहा। 7 अक्टूबर को चूरू नगरपालिका को फिर से क्रमोन्नत कर नगर परिषद का दर्जा दिया गया। इस तरह पालिकाध्यक्ष रमाकांत ओझा ही नगर परिषद की दूसरी पारी के पहले सभापति हो गए। इससे पहले पालिका बोर्ड में अध्यक्ष गौरीशंकर मण्डावेवाला रहे। यह चुनाव वे निर्दलीय के रूप में जीते थे। बोर्ड अध्यक्ष बनने के लिए उन्होंने भाजपा सदस्यता स्वीकार कर ली थी। आज से करीब तीन साल पहले मण्डावेवाला पार्टी बदलकर कांग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में उनका कांग्रेस से भी मोहभंग हो गया। नतीजतन वर्तमान स्थानीय निकाय चुनाव में उन्होंने दोनों ही पार्टी प्रत्याशियों के विरुद्ध निर्दलीय के रूप में ताल ठोककर मुकाबला रोचक व त्रिकोणीय बना दिया।

- भाजपा प्रत्याशी

रमाकांत ओझा

क्या है ताकत

बेदाग छवि

कुशल व्यवहार

जातिगत आधार

संगठन से जुड़ाव

सभापति पद का अनुभव

क्या है कमजोरी

सभापति पद पर रहते स्वाभाविक नाराजगी

भाजपा बागी होने का दाग

कांग्रेस प्रत्याशी

-गोविन्द महनसरिया

क्या है ताकत

राज्य में कांग्रेस सरकार

कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता

विधायक का वरदहस्त

बेदाग छवि, मिलनसार

अल्पसंख्यकों का समर्थन

क्या है कमजोरी

कांग्रेस के बागी की मैदान में मौजूदगी

मतों का विभाजन

Tuesday, December 1, 2009

जागरुकता बढ़ी रोगी हुए नहीं कम

विश्व एड्स दिवस आज
चूरू, 30 नवम्बर। जिले में एड्स रोगियों की संख्या बढ़ रही है। इस साल में अब तक करीब तैंतीस रोगी एड्स पॉजीटिव पहचाने जा चुके हैं। इनमें तीन तो गर्भवती महिलाएं हैं। गत वर्ष की तुलना में एड्स रोगियों की संख्या में करीब ग्यारह की वृद्धि हुई है।
यह बात ओर है कि एड्स की जांच के प्रति लोगों की जागरुकता काफी बढ़ी है लेकिन एड्स से बचाव के प्रति सावधानी बरतने पर ध्यान उतना ही कम दिया जा रहा है।जिला मुख्यालय स्थित डेडराज भरतीया अस्पताल और थ्रू नेटवर्क व पॉजीटिव वूमन नेटवर्क नामक स्वयं सेवी संस्थाओं से मिली तथ्यात्मक जानकारी के अनुसार जिले में उपखण्ड स्तर पर एड्स रोगियों का आंकड़ा चौंकाने वाला है।
थ्रू नेटवर्क के अध्यक्ष आसुराम जांगिड़ के अनुसार चूरू जिले में अब तक करीब चार सौ एड्स रोगी पहचाने जा चुके हैं। इनमें सर्वाधिक करीब एक सौ रोगी सुजानगढ़ उपखण्ड के हैं। पैंतालीस रोगियों के साथ सरदारशहर दूसरे नम्बर पर आता है। राजगढ़ में चालीस एड्स पॉजीटिव हैं वह इस मामले में तीसरे पायदान पर है जबकि रतनगढ़ और चूरू शहर में करीब तीस से पेंतीस रोगी हैं। तारानगर इस मामले में पांचवे स्थान पर है यहां सिर्फ छह रोगी पहचाने गए हैं।बकौल आसुराम चिंता और चिंतन की बात तो एड्स पीडि़त बच्चों को लेकर है। जिले में करीब 42 बच्चे एड्स पीडि़त हैं।
इनमें से करीब एक दर्जन अनाथ हैं। शेष बच्चों में किसी के मां है तो किसी के पिता जीवित हैं। चूरू शहर की एक एड्स पॉजीटिव बच्ची को तो हाल ही में जयपुर स्थित पॉजीटिव वूमन नेटवर्क की संचालक मुकेश यादव को सौंपा गया है। बच्ची के परिवार में पिता नहीं है। मां है किन्तु उसकी भी स्थिति अच्छी नहीं है। बकौल मुकेश यादव उसके पास करीब पन्द्रह बच्चे हैं जिनकी वह देखभाल करती है। इनमें अकेले चूरू ही नहीं बल्कि सीकर, झुंझुनूं के भी एक-एक बच्चे भी हैं। इसके अलावा बाड़मेर, उदयपुर, जालौर, कोटा आदि जिलों के भी बच्चे हैं।चूरू स्थित ऐंटी रिट्रोवायरल थैरेजी सेंटर (आसीटीसी) से मिली जानकारी के अनुसार पिछले एक-दो सालों में एड्स जांच के प्रति लोगों में जागरुकता देखी गई है। सेंटर पर सालाना एक से डेढ़ हजार लोग जांच एवं काउंसलिंग के लिए आते हैं। इस वर्ष में अब तक गुजरे ग्यारह माह में ग्यारह सौ लोगों ने सामान्य रूप से जांच परामर्श लिया है। वहीं करीब सौलह सौ गर्भवती महिलाओं के रक्त जांच के साथ ही एड्स संबंधित जांच भी की गई है। इनमें से एड्स पॉजीटिव तीस मामले तो सामान्य जांच में तथा तीन मामले गर्भवती महिलाओं के रक्त जांच में सामने आए हैं। गतवर्ष सामान्य परामर्श के लिए आए पन्द्रह सौ लोगों की जांच में बीस तथा करीब आठ सौ गर्भवती महिलाओं के रक्त जांच में एक मामला पॉजीटिव पाया गया था।

लोगों में पहले से जागरुकता बढ़ी है। लोग जननांगों में थोड़ी सी भी तकलीफ होने पर तुरन्त जांच के लिए आते हैं। जिन लोगों को परामर्श दिया गया है वे तो सावधानी भी अपनाते हैं। फिर भी लोगों को एड्स से बचाव के लिए सावधानियां बरतने पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
प्रदीप अग्रवाल, प्रभारी आईसीटीसी, चूरू
स्क्रीनिंग पहले से अधिक गहन कर दी गई है। गर्भवती महिलाओं के रक्त की जांच के साथ एड्स संबंधित जांच को अनिवार्य कर दिया गया है। रक्त लेने और देने में मरीज के नजदीकी को ही प्राथमिकता दी जा रही है।
-डा. रवि अग्रवाल,प्रभारी ब्लड बैंक, डेडराज भरतीया अस्पताल, चूरू
एड्स रोगी के प्रति परिवार का नजरिया अभी पॉजीटिव नहीं है। पहले समाज का नजरिया संवेदनशील हो तो ही समाज भी सकारात्मक होगा। एड्स पॉजीटिव महिलाओं को परिवार में सर्वाधिक प्रताडऩा व जिल्लत भुगतनी पड़ रही है जबकि उसका दोष तनिक भी नहीं होता। बच्चों के प्रति समाज को नजरिया अभी बदलना है।-मुकेश यादव
जिले में एड्स रोगी बढ़े हैं। सबसे ज्यादा रोगी सुजानगढ़ में हैं। पहचाने गए रोगियों को उपचार दिलाया गया है। फिर भी ग्रामीण स्तर पर लोगों में एड्स से बचाव के प्रति बरती जाने वाली सावधानियों पर ध्यान कम दिया जा रहा है।
-आसुराम जांगिड़, अध्यक्ष, थ्रू नेटवर्कूमन नेटवर्क ऑफ राजस्थान, जयपुर

Tuesday, November 24, 2009

विश्वास पाना अभी शेष है

चूरू।शहरवासियों ने शहरी सरकार चुन ली। चुनाव नतीजों के रूप में लोकतंत्र के इस महायज्ञ की पूर्णाहुति हो गई। नतीजे सबके सामने हैं। अपनी सरकार चुनने में शहरवासियों ने पूरा श्यानापन दर्शाया। अपनी सूझबूझ और परिपक्वता का परिचय दिया। तुम जीते न मैं हारा की तर्ज पर सटीक फैसला सुनाया। जनता के मन मंदिर से कोई छिटका तो किसी ने प्रसाद पाया। चुनावी वैतरणी पार करने की जद्दोजहद में जुटे पैंंतालीस वार्ड प्रत्याशियों में से बाईस का जनता ने हाथ थाम लिया तो बीस के हाथों में कमल का फूल थमा दिया। जिन तीन वार्डों में निर्दलियों ने जनता का आशीर्वाद पाया वे व्यवहार और व्यक्तित्व के धनी थे। निवर्तमान सभापति रमाकांत ओझा को तो जनता के दरबार से धक्का लगा। गोविन्द महणसरिया ने प्रसाद पा लिया।जनता जनार्दन की यही खासियत है। यही लोकतंत्र की मजबूती। जनता कब किसी को तख्तेताज सौंप दे कब किसी के पैर के नीचे बिछी जाजम खींच ले। कांग्रेस से सभापति पद के उम्मीदवार गोविन्द महणसरिया का निर्वाचन कुछ ऐसा ही रहा। कांग्रेस के सिपाही के रूप में उनकी वर्षों की साधना का उन्हें प्रसाद मिल गया। शहरवासियों के लिए वे एक ऐसी शख्सीयत बनकर उभरे जिसे लेकर स्वयं उनकी जमात के लोग आशंकित थे। टिकट वितरण को लेकर उपजे असंतोष ने बाजार में उनकी हवा बिगाड़ रखी थी। रही सही कसर बागियों के रूप में चुनाव मैदान में ताल ठोकने वालोंं ने पूरी कर दी थी। इस बार राज योग उनकी ही हथैली पर लिखा था। इसी लिए हाजी मकबूल को गोविन्द कबूल था। मकबूल का मतलब होता है जो अच्छा उसे ग्रहण करो। गोविन्द के नाम की तो जनता वैसे ही दीवानी है। उसे कबूल करने में जनता ने जरा भी भूल नहीं की। गोविन्द महणसरिया को जनता ने ठीक वैसे प्रसाद पकड़ाया जैसे मंदिर में लगी भीड़ में सबसे पीछे खड़े किसी भक्त का भगवान ने स्वयं उठकर हाथ थाम लिया हो। यह महणसरिया के लिए तो विचारणीय है ही, जनता का पुन: विश्वास पाने से पिछड़े रमाकांत ओझा के लिए चिंतन और मंथन का विषय भी।पर कहते हैं कि राजनीति में भगवान रूपी जनता भी उसी भक्त का साथ निभाती है जो कर्म में विश्वास करता है। दीनहीन-गरीब पर उपकार करता है। निशक्त और असहायों को सम्बल देता है। कत्र्तव्यों को समझता है और दायित्वों को निभाता है। जो राम और रहीम को बराबर का दर्जा देता है। जिसकी करनी और कथनी में भेद नहीं होता। जिसके आचरण में शुद्धता और चरित्र में स्वच्छता बसती है। जिसकी वाणी में मिठास और व्यवहार में सौम्यता रमती है। जो हर खास और आम के सुख-दुख में उसके साथ होता है। जो अपने और पराए में भेद किए बिना घर-परिवार, मोहल्ला और समाज, राज्य और राष्ट्र धर्म की पालना करने में संतुलन बनाए रखता है।शहर के प्रथम नागरिक के रूप में चुने जाने पर गोविन्द महणसरिया की तथा वार्ड प्रतिनिधि चुने जाने पर प्रत्येक पार्षद की अगले पांच वर्षों के लिए यही भूमिका होनी चाहिए। जनता का मत तो उन्हें मिल गया। विश्वास पाना अभी शेष है।

Monday, November 23, 2009

शहर से प्रेम दर्शाओ

सन्तोष गुप्ता
चुनाव प्रचार का शोर-शराबा थम गया है। भौंपुओं का मुंह बंद हो गया है। सभाओं की जोड़-तोड़ घट गई है। रैलियों की दौड़-धूप मिट गई है। कार्यकर्ताओं का रूठना-मनना लगभग खत्म सा हो गया है। दोस्त-दुश्मनों में मान-मनौव्वल का दौर भी पट गया है। मनाने वाले थके से दिखाई देने लगे हैं। मानने वाले कम ज्यादा ले-देकर मान गए हैं। उम्मीदवारों ने गंभीरता ओढ ली है। चाल-चलन में शालीनता ढाल ली है। उनके चेहरे की मुस्कान समर्थकों की भीड़ के अनुपात में घटने-बढऩे लगी है।
इसका एक कारण यह भी है कि मतदाता ने उम्मीदवार को जान लिया है। उम्मीदवारों ने समर्थकों को पहचान लिया है। जिसको जो कहना था उसने वह कह लिया है। जिसे जो सुनना था उसने वो सुन लिया है। अब किसी के पास न गिले शिकवे रहे न शिकायत बची है। सिर्फ शहर से प्रेम का इजहार बाकी है। सोमवार को मतदान के मद्देनजर उलटी गिनती शुरू हो गई है।शहरवासियों के लिए शहर से प्रेम के इजहार का समय आ गया है। कहते हैं प्रेम को शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। प्रेम को अनुभूत किया जाता है। प्रेम के परिपक्व होने की कामना की जाती है। शहरी समस्याओं से निजात और शहर के विकास की खातिर शहर से प्रेम करने वालों के लिए २३ नवम्बर का दिन किसी 'वेलेंटाइन-डेÓ से कम नहीं है। उन्हें यह सुनहरा मौका यूं ही नहीं गंवाना है। घर से मतदान केन्द्र की दूरी चाहे जितनी हो, सर्द हवाएं चाहे खूब ठिठुराएं, पारिवारिक परेशानियां कदम रोकें पर शहर से प्रेम का इजहार करने से ठिठकना नहीं है। निर्भिकता से घर से निकलना है और एक नहीं एक साथ दो को चुनना है। अब तक मतदाता अपने वार्ड के प्रतिनिधि को चुनता था। फिर वह प्रतिनिधि अपने नेता को चुनता था। इस बार मतदाता शहर के प्रथम नागरिक और वार्ड प्रतिनिधि दोनों का चुनाव एक साथ करेगा। इसलिए मतदाता की दोहरी जिम्मेदारी हो गई है। उसे चौंकन्ना रहना होगा। सोचना समझना और फिर चुनना होगा।अब तक जो हुआ वह सामान्य था। इसमें नया कुछ भी नहीं। ऐसा पहले से होता आया है। लेकिन अब जो भी कुछ होगा वह दोनों के लिए खास रहेगा। उसके लिए जिसे चुना जाना है, विशेष है ही। जिन्हें अपने शहर के विकास के खातिर योग्य नेता चुनना है, उनके लिए कुछ ज्यादा विशेष है। उन्हें तो चौतरफा सजगता और सतर्कता बरतने की जरूरत होगी। अगले चौबीस घंटों में जिसे चुना जाना है वह अपने समर्थकों को और समर्थक अपने मिलने-जुलने वालों को रिझाएंगे। उनका मत पाने को उन्हें ललचाएंगे भी। घर-घर देवरियां ढोक लगाएंगे। रिश्ते-नाते गिनाएंगे। पुरानी दोस्ती भुनाएंगे। गाहे-बगाहे किए अहसान याद दिलाएंगे। सौगात और भेंट भी दी जा सकती है। पंगत में लंगर और बस्ती में बक्से बांटे जा सकते हैं।
यही वह स्थिति होगी जब मतदाता अवसरवादियों की बनाई हवा में बह सकता है। क्षणिक लाभ और मोह में बिक सकता है। प्रत्याशी के लुभावने वादों और शहद लिपटी बातों में जकड़ सकता है। मतदाता को विचार करना होगा कि उसकी जरा सी भूल न सिर्फ उसे बल्कि शहर को पांच साल तक भुगतनी पड़ सकती है। शहर से प्रेम में दीवाना हुआ जा सकता है, प्रेम में अंधा बना जाए यह शहर को गंवारा न होगा।

आओ चुन लें खुद को

स्थानीय निकाय चुनाव का बिगुल बज गया है। राजनीतिक सरगरर्मियां बढऩे लगी है। गली-मोहल्ले, नुक्कड़-चौपाल, सड़क-बाजार हर ओर चुनावी रंगत जमने लगी है। राजनीति में वर्षों से रमे और राजनीति में रमने के इच्छुक आपस में जुडऩे लगे हंै। चाय की थड़ी हो या कलेक्ट्री के बाहर लगा दाल-पकोड़ी का ठेला। चुस्की और चटकारे के साथ हर कोई चुनावी चर्चा में रमा है। धवल वस्त्र पहने जहां-तहां नमस्कार की मुद्रा में खड़े दिखाई देने वालों पर तो टिप्पणियां होने लगी हैं। कै...भाईजी थे भी लडरिया हो कै...कठे सूं.... ऐसी आवाज तथाकथित नेताजी के कानों में पड़ते ही उनके चेहरे की मुस्कराहट दोगुनी हो जाती है। टिप्पणी करने वाला उनका आलोचक है कि समर्थक, निन्दक है कि शुभचिंतक वे नहीं जानते। वो तो बेशक मुस्कुरा के आगे बढ़ गए, टिप्पणी करने वाले के लिए बात यहां खत्म नहीं हुई बल्कि यहां से शुरू हो गई। चाय की थड़ी पर बैठे-बैठे नेताजी का भूत-भविष्य और वर्तमान पढ़ा और गढा जाने लगा। सम्भवत: वे यह भूल गए कि धवल वस्त्रधारी ने तो खुद को समाज के लिए प्रस्तुत कर अपने साहस और समर्पण का सद्भाव पूर्ण प्रदर्शन भर किया है। उसे नेता बनाना या न बनाने का अधिकार तो उन्हीं के हाथ में है। खैर, यह मानवीय स्वभाव है। इसे न रोका जा सकता है न टोका जा सकता है। लोकतंत्र की व्यवस्था ही कुछ ऐसी है। यहां खुद कुछ करो या ना करो। सामने वाले पर टीका-टिप्पणी करो या सराहना आपके विचार अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार की हर हाल में रक्षा होगी। चूरू के लिए यह उत्थान का समय है। उठने का समय है। जागने का समय है। न सिर्फ जागने का बल्कि जागते हुए भविष्य संवारने का समय है। इसे जिला मुख्यालय का दर्जा भले ही दशकों पूर्व मिल गया हो पर जिला मुख्यालय होने का सा गौरव वह अब तक नहीं पा सका है। चूरू में निसंदेह काफी विकास हुआ, यह कोई नहीं नकारता। फिर भी अन्य जिलों से चूरू पिछड़ा हुआ है, यह हर कोई स्वीकारता है। बमुश्किल एक साल हुआ जबकि चूरू को यहां की आबादी और विकास के मद्देनजर नगरपालिका से नगरपरिषद में क्रमोन्नत किया गया। नगरपरिषद का दर्जा पाकर शहरवासियों की उम्मीद जागी। अपेक्षाएं बढ़ीं। चूरू को अन्य शहरों सा दिखने और देखने की तमन्ना हुई। लेकिन बीते साल में शहर की फिजां और फितरत कितनी बदल पाए? कितने नेता और नौजवान इसके लिए आगे आए। मूलभूत सुविधाओं के अभाव और अभियोगों पर किसने आवाज उठाई? चूरू में क्या-क्या नया जोड़ पाए? गंदे पानी की निकासी की समस्या दूर होना तो दूर क्या उसके निराकरण की ठोस योजना भी बना सके। सड़कों का समतलीकरण भले न कर सके हो क्या गुणवत्ता पूर्ण एक भी सड़क बना सके। पीने के पानी का एकत्रीकरण और शुद्धिकरण की क्या किसी ने सुध ली। शहरी सौंदर्यीकरण और पर्यावरणीय अनुकूलन की दृष्टि से ठोस कचरा प्रबंधन का कभी विचार किया। सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक समृद्धता की कभी पहल हुई। रोजगार और औद्योगिकीकरण पर किसने कितना ध्यान दिया। खेत और खलिहानों का क्या क्षमतानुकूल उपभोग हो सका।... देखलेस्यां...... करलेस्यां.... होजासी.....कीहोसी....के बंटै....जैसे जुमले जुबान से निकले और जेब में पड़ी गुटखे की पुडिय़ा मुंह तक पहुंची...हो गया बस।...मुंह बंद।सेठ, साहूकारों, धनपतियों की पुश्तैनी इमारतों और हवेलियों के होने, साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने, अतीत पर ही मुस्कराते रहने से ही कुछ होता तो गुजरे बरसों में बहुत कुछ हो जाता। जिस शहर की कारोबारी हलचल आज भी गधा रेहडिय़ों पर घिसट रही हो, नौजवान अच्छा पढऩे-लिखने को पड़ोसी जिले की ओर झांकते हों और रोजी-रोटी कमाने विदेश पलायन कर जाते हों, जहां एक प्याली चाय और ऑटो में शहरभर में कहीं भी आने-जाने का खर्च एकसा मात्र पांच रुपल्ली हो, जहां सूर्य अस्त होते ही व्यापारी कारोबार समेटने लगते हों, मजदूर औजार छोड़ देता हो और रेहड़ी वाला पशु खोल देता हो वहां की दिशा और दशा बदलने के लिए निश्चित ही कोई कर्मवीर और धर्मवीर चाहिए। विशेष तौर पर उस दौर में जबकि आधी दुनिया को राजनीति में पंचायती करने का आधा हक मिल गया है। खास तौर पर तब जबकि सभापति और पालिकाध्यक्ष का चयन सीधे आमजन को करना है। चाय और पकोड़ी के साथ थडिय़ों पर बैठकर बतियाने और हथेली पर तम्बाकू चुर्रट रगड़ते रहने का वक्त अब नहीं रहा। समय करवट ले रहा है। आप भी उठ खड़े हों। आंखें खोलें। कुछ कर गुजरने को हाथ-मुंह धोलें। कैसा चूरू चाहते हैं आप? किससे मेल खाता है आपका विचार? किसके पास है आपकी कल्पना को साकार करने की क्षमता? कौन दे सकता है आपको सही नेतृत्व? मतदान का दिन २३ नवम्बर पलक झपकते आ जाएगा। किसी और को चुनने के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग करें उससे पहले जरूरी है कि आप खुद को चुनें। किसके पक्ष और समर्थन में आप खुद को खड़ा देखना चाहते हैं। किसे अपना तन-मन-धन से समर्थन देना चाहते हैं। किसके हाथों में शहरी विकास की डोर सौंपना चाहते हैं।आपके दर पर कर्मवीर, धर्मवीर, धनवीर, बलवीर आदि चुनावी रणवीरों की अब शुरू होगी दस्तक। चूरू आपका है। चुनना आपको है। निर्णय आपका है।

Monday, November 9, 2009

माळा पेरावो, पगळया करवावो

मंत्रीजी का स्वागत, मास्टरजी की आफत
संतोष गुप्ता

चूरू, 9 नवम्बर। सुशासन और संवेदनशील सरकार से राहत की आस ग्रामीणों के गले की फांस बन गई है। सरकार में कृषि एवं पशु पालन मंत्री हरजीराम बुरड़क का अपने ही गृह क्षेत्र के गांवों में पगफेरा ग्रामीणों पर भारी पडऩे लगा है। 'नोटां री माळा पेरावो, मंत्री का पगळया करवावोÓ जैसा जुमला हर खास और आम ग्रामीणों की जुबान पर चढऩे लगा है।

सूखे और अकाल से जूझ रहे ग्रामीण अपने पेट पर पट्टी बांध कर गांव के भले की आस में मंत्री को नोटों का हार पहनाने पर मजबूर हैं। मोटे तौर पर दिखाई देने वाली ग्रामीणों की इस मजबूरी में क्षेत्र के चंद अवसरवादी लोगों का भी स्वार्थ है। आगामी पंचायतीराज चुनाव के मद्देनजर वे जहां ग्रामीणों पर अपना रुआब बना रहे हैं वहीं मंत्रीजी पर अपना प्रभाव जमा रहे है।

हैरत की बात है कि गांव के बुजुर्ग ग्रामीण अवसरवादियों की इस फितरत को समझते हैं फिर भी अपने घर-परिवार में अमन चैन की खातिर उनके इशारे पर चलते हैं। रविवार को ही मंत्रीजी का लाडनूं तहसील के चार गांवों का दौरा ग्रामीणों पर लाखों का पड़ा। मंत्री बुरड़क मालगांव, गेनाणा, रताऊ और सिकराली गांव में भले ही ग्रामीणों के अभाव-अभियोग सुनने के बहाने गए हों पर लौटे तो उनके गले में करीब तीन लाख चवालीस हजार एक सौ एक रुपए के गांधी छाप नोटों की माला थी। आश्चर्य किन्तु सत्य है कि ग्रामीणों को मंत्रीजी के गले में नोटों का हार डालने की जितनी खुशी हुई उससे ज्यादा उनके लौटने पर मलाल हुआ।

मंत्रीजी ने गांव के विकास की कोई घोषणा करने के बजाय उनकी उम्मीद पर यह कह कर पानी फेर दिया कि वे कहने में नहीं कर के बताने में विश्वास रखते हैं। लाडनूं तहसील के सबसे बड़े गांव रताऊ में बुरड़क का ग्रामीणों ने जोरदार स्वागत किया। यहां उन्हें सर्वाधिक दो लाख एक हजार एक सौ एक रुपए की माला पहनाई गई। वहीं मंत्री पुत्र जगन्नाथ बुरड़क को इक्कीस हजार रुपए के नोटों की माला से नवाजा गया। ग्रामीण प्रेमाराम बिडिय़ासर, प्रभुराम बेड़ा, गणेशाराम बिडियासर, रामसुख राड, रूपाराम बावरी तथा रामचंद्र भाखर ने बताया कि दो लाख घाल्या जद पगळया कराया।....इसू पेली ग्यारहा महीना सूं गांव वाळास्यूं रुख नहीं मिला रया हा....मंत्रीजी गांव वाळा सूं मुंह फेर बैठग्या...। ग्रामीणों को मलाल रहा कि पूरे लाडनूं तहसील में रताऊ गांव ही था जिसने बुरड़क को सर्वाधिक सत्तरह सौ मतों की बढ़त दिलाई थी। गांव वालों को उम्मीद थी कि मंत्री बनने पर वे खुद आकर ग्रामीणों का आभार व्यक्त करेंगे। किन्तु ऐसा हुआ नहीं। गांव के हर घर से रुपए एकत्र किए गए। स्कूल के मास्टरों ने रुपए दिए तब कहीं जाकर मंत्री जी का गांव में पगळया हुआ। ग्रामीणों ने बताया कि बावरी कच्ची बस्ती में गंदे पानी की गेनाणी के निकास, स्कूलों में विषय अध्यापकों की नियुक्ति, चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार और गांव की सड़क निर्माण तथा मीठे के पानी की व्यवस्था कराए जाने की मंत्री से उम्मीद थी। आळ माला पहराई है....आगे देखस्यां....म्हाने...देखताने...अतराबरस हुईग्या...हालतक तो कांई...हुयो कोनी...। सड़क बनवााबा के वास्ते मंत्रीजी कहग्या वी के बन्वा की कई सालासूं सुणंरयां हां...अबे तक तो बणी कोणी...। ग्राम गेनाणा में बुरड़क को करीब इक्यावन हजार रुपए नकद राशि का लिफाफा भूराराम चोयल व सरपंच सहदेव डारा ने ग्रामीणों की ओर से भेंट किया। यहां मंत्री को समस्याएं सुनाने पहुंची महिला श्रमिकों को अनसुना किया गया। नरेगा श्रमिक भंवरी व पांची ने बताया कि वे अपनी समस्या बताना चाहती थी किन्तु उन्हें बोलने ही नहीं दिया गया। खींवाराम राड ने मंत्रीजी को भरी सभा में टोकते हुए कहा कि तुम्हारी बातें बहुत सुन ली है। इन श्रमिकों को सुनो जिन्हें तेरह-बीस रुपए मिल रहे हैं। इतना कहते ही मंत्री के साथ आए लोगों ने उसे बैठा दिया, बोलने नहीं दिया। बुरड़क ने इस गांव में सामुदायिक भवन बनाने की घोषणा की। यहां उन्होंने अपनी घोषणा में कहा कि ग्राम पंचायत पट्टïा देती हो तो वे वहां सामुदायिक भवन बनाने के लिए पांच लाख रुपए देगें। जोरदार पहलू यह है कि बुरड़क ने जिस स्थान के लिए पंचायत का पट्टïा मांगा वह जमीन पंचायत की है ही नहीं, वह गोचर भूमि है जहां पंचायत पट्टïा नहीं दे सकती। बुरड़क को गांव सिकराली में भी इक्यावन हजार रुपए व मालगांव में इक्कीस हजार रुपए की माला पहनाई गई।कईयों ने कर दिया राशि देने से मना मंत्री के दौरे पर स्वागत के लिए राशि देने से कई शिक्षाकर्मियों ने इंकार कर दिया। शिक्षकों ने नाम नहीं देने की शर्त पर बताया कि उनसे शिक्षा विभाग के ही एक अधिकारी और एक व्याख्याता ने इक्कीस सौ रुपए राशि मांगी थी। एक शिक्षक ने तो बताया कि उनके परिवार से तीन भाई शिक्षक हैं। तीनों से राशि मांगी गई किन्तु परिवार के हिसाब से राशि देकर पीछा छुड़ाया। एक विकलांग शिक्षक ने तो साफ तौर पर इस कार्य के लिए राशि देने से यह कहकर मना कर दिया कि जहां भी तबादला करवाना हो वहां करवा देना। गौरतलब है कि मंत्री के स्वागत के लिए रताऊ गांव से बाहर सेवारत शिक्षकों से भी राशि एकत्रित की गई।

मंत्रीजी .........लेणों ही सीख्या हैै.....। ग्राम रताऊ के बुजुर्ग ग्रामीण गणेशाराम बिडियासर व प्रभुराम बेडा आदि ने कहा कि मंत्रीजी देणों कौनी सीख्या है... लेणों ही सीख्या हैै... यही दो लाख रुपया गांव के मवेशियां के चारा और कच्ची बस्ती के गंदे पानी के निकासी के लिए बढ़ाकर दे देते तो गांव वालों को और खुशी होती। मंत्रीजी आज तक कदै ही माळा का रुपया वापस कौनी दिया....।

इनका कहना है...........

सूखा-अकाल, बिजली, पानी एवं मंहगाई से त्रस्त गरीब गांव वालों से नोटों की माला पहनकर कृषि मंत्री ने पारदर्शी संवेदनशील व जवाबदेह सरकार के कथनी और करनी में अन्तर को उजागर कर दिया। वे जब से मंत्री बनें हैं तब से अब तक करीब 30 लाख से अधिक रुपयों की माला स्वीकार कर चुके हैं और लाखों के चांदी के जग ग्रामीणों से पा चुके हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत यदि वाकई गरीब जनता के प्रति संवेदनशील हैं तो उन्हें अपने मंत्रिमंडल के इस साथी से हिसाब मांगना चाहिए और ये राशि सहायता कोष में जमा करानी चाहिए।

-एडवोकेट जगदीशसिंह, पूर्व उपप्रधान, पंचायत समिति, लाडनूं

पानी को प्यासे ग्रामीण और चारे को तरसते मवेशियों को राहत देने की बजाय कृषि मंत्री हरजीराम बुरड़क गरीब पशुपालकों और काश्तकारों की जमा पूंजी भी हजम कर रहे हैं। यदि सरकार की गरीब जनता व काश्तकारों के प्रति यही संवेदनशीलता है तो फिर मुझे कुछ नहीं कहना है।

-नाथूराम कालेरा, अध्यक्ष, भाजपा ग्रामीण मंडल, लाडनूं

कृषि मंत्री बुरड़क गांवों में अभाव-अभियोग सुनने के नाम पर दौरा कर ग्रामीणों से पिछले 11 महिनों से चौथ वसूली कर रहे हैं। ऐसे मंत्री को पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उनके स्वागत के लिए एकत्रित की जा रही राशि सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों से ही संभव है। सरकार को चाहिए कि वे जनता को ऐसे मंत्रियों से भयमुक्त कराए।

-हनुमानमल जांगिड़, अध्यक्ष, भाजपा शहरी मंडल, लाडनूं

जनप्रतिनिधि का स्वागत होता रहा है, यह कोई नई बात नहीं है। हरजीराम बुरड़क के मंत्री बनने पर मैं भी उनके साथ कुछ गांवों में आयोजित सम्मान समारोह में गया था। मैनें तो मुझे पहनाई गई नोटों की माला में कुछ राशि और जोड़कर ग्रामीणों को लौटा दी थी मेरे सामने मंत्रीजी ने भी शायद ऐसा ही किया था। उसके बाद मैं कभी मंत्रीजी के साथ नहीं जा सका।

- रूपाराम डूडी, विधायक, डीडवाना

कांग्रेस सरकार के गठन के 11 माह बीत जाने के बाद भी मंत्रिमंडल के सदस्यों में अपना स्वागत सत्कार कराने की इच्छा खत्म नहीं होना आश्चर्यजनक है। अब तो जनता के दु:ख-दर्द मिटाने का समय है। अकाल से जूझ रहे ग्रामीणों से नोटों की माला पहनकर हर्षित हो रहे मंत्री आखिर जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं?

- मनोहरसिंह, पूर्व विधायक, लाडनूं

मंत्री हरजीराम बुरड़क के स्वागत-सत्कार के लिए ग्रामीणों से जबरन एकत्रित की जा रही राशि की जानकारी उन्हें भी मिली है। यह वक्त वाकई ऐसा नहीं है जबकि सरकार का कोई मंत्री गांवों में जाकर इस तरह अपना स्वागत करवाए। इस सम्बन्ध में मुझे जो भी कुछ जानकारी मिली है वह मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एवं कांग्रेस संगठन को भिजवाई जा रही है।

- अंजना शर्मा, कोषाध्यक्ष, प्रदेश कांग्रेस महिला प्रकोष्ठï, लाडनूं

जनता जनप्रतिनिधियों का स्वागत करती रही है, ये तो जनप्रतिनिधि के अपने संस्कार और नैतिकता होती है कि वे जनता द्वारा भेंट की गई राशि में अपनी ओर से कुछ मिलाकर जनसेवा के लिए ही उन्हें वापिस सौंप दें। मंत्री हरजीराम बुरड़क यदि ऐसा नहीं करते हैं तो खेदजनक है।

- लियाकतअली खान, पराजित प्रत्याशी, कांग्रेस, लाडनूं

क्षेत्र के ग्रामीण दौरे पर जनता की ओर से किये गए स्वागत सम्मान की मैं कद्र करता हूं। उनकी ओर से भेंट की गई राशि का देखेंगे क्या करना है।

-हरजीराम बुरड़क, कृषि एवं पशुपालन मंत्री, लाडनूं

Thursday, October 15, 2009

'अंकुश' के बिना कैसे कसे शिकंजा

पुलिस डाल-डाल, माफिया पात-पात

अवैध शराब माफिया का फैलता जाल

चूरू, 14अक्टूबर। समान नीति और साफ नीयत के अभाव में जिले में अवैध शराब माफिया का पेट और पैठ गजराज की तरह बढ़ता ही जा रहा है। इस पर शिंकजा कसने के लिए आबकारी विभाग और आबकारी निरोधक दल के हाथ में 'अंकुशÓ (स्टाफ व संसाधन ) तक नहीं है। शराब के अवैध कारोबार की रोकथाम के लिए राज्य में करीब डेढ़ सौ थाने हैं, लेकिन आधे से ज्यादा खाली पड़े हैं। चूरू जिले में ही अकेले राजगढ़ वृत से जिले भर में कार्रवाई की जा रही है। शेष तीन थानों में अधिकारी नहीं है। स्थिति यह है कि कहीं अधिकारी है तो स्टाफ नहीं, कहीं स्टाफ है तो अधिकारी का टोटा। सिविल पुलिस महकमे के हालात भी कुछ कम नहीं है, उसके लिए शराब के अवैध कारोबार की रोकथाम अव्वल तो प्राथमिकता में नहीं आती। पुलिस के पास अपने ही बहुत काम हैं। फिर जहां कहीं शराब के अवैध कारोबारी सक्रिय हैं वहां पुलिस सक्रियता ही नहीं दिखाती है। अवैध शराब की धरपकड़ के आए दिन दर्ज होने वाले मुकदमे पुलिस और आबकारी विभाग की कागजी खानापूर्ति भर हंै। जबकि शराब के अवैध कारोबारियों के हौंसले इतने बुलन्द हैं कि पुलिस जहां डाल-डाल चलती है वहां वे पात-पात पनप रहे हैं। राज्य की शराब नीति ने इसमें चांदी की बरक का ही काम किया है। इनकी धर-पकड़ में पुलिस के कमजोर पड़ते इकबाल का ही नतीजा है कि गैंगवार होने लगी हैं। कारोबारी रंजिश के चलते सरेराह दहशतगर्दी ने कानून एवं शांति व्यवस्था को चुनौती देनी शुरू कर दी है।

नीति में ही है खोट

मोटेतौर पर देखा जाए तो इसके लिए राजस्थान की आबकारी नीति भी कुछ हद तक जिम्मेदार है। यहां शराब कारोबारियों के लिए दुकान पाने की कीमत कम है और शराब महंगी है। जबकि पड़ोसी राज्य हरियाणा, पंजाब में दुकानों के आवंटन की कीमत अधिक व शराब सस्ती है। राजस्थान में तो देशी शराब के लिए प्रतिमाह का कोटा आवंटित होता है। अंग्रेजी व बीयर बेचने के लिए कोई कोटा नहीं है। ऐसी स्थिति में बोर्डर से जुड़े गांवों में लोगों ने शराब के कारोबार को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी है। मात्र पच्चीस हजार रुपए सलाना जमाकरा कर देशी शराब के ठेके पर ही अंग्रेजी और बीयर बेची जाने लगी है। इसकी सीमा नहीं होने का नतीजा है कि पड़ोसी राज्य से सस्ती शराब लाकर धड़ल्ले से बेची जा रही

डीजल भी है सस्ता

पड़ोसी राज्यों में शराब ही नहीं डीजल भी सस्ता है। सीमा क्षेत्र में रहने वाले लोग डीजल भराने के लिए हरियाणा, पंजाब जाते है और लौटते समय शराब लेकर आ जाते है। इससे उन्हें भारी मुनाफा होने लगा है। डीजल में प्रति लीटर करीब तीन से चार रुपए का फायदा है वहीं शराब की एक बोतल पर करीब पचास से साठ प्रतिशत का लाभ है। लोगों ने इसे कमाई का सबसे सस्ता और सरल धंधा मानकर अपनाना शुरू कर दिया

मुनाफे ने पनपाए माफिया

अधिक मुनाफा होने से शराब के अवैध कारोबारी पनप गए। जो लोग पहले साथ में काम किया करते थे उन्हीं में से अलग हुए सदस्यों ने अलग से कारोबार शुरू कर दिया। इससे अलग-अलग गैंग बन गई। एक दूसरे के क्षेत्र में सप्लाई को लेकर दुश्मनी होने लगी। नतीजा रहा कि आपसी रंजिश में सरेराह दहशत गर्दी बढ़ गई। पिछले दिनों सादुलपुर में हुआ संजय नायक हत्याकाण्ड, रतनगढ़ में मकान पर चली गोलियां ऐसे ही पनपी गैंग की करतूत

पक्की सड़कों ने दी गति

केन्द्र व राज्य सरकार की ग्राम सम्पर्क सड़क योजनाओं के तहत हर छोटा बड़ा गांव पक्की सड़कों से जुड़ गया है। काश्तकारों के पास चौपहिया वाहन भी हैं। हालात यह है कि सस्ते और सरल शराब कारोबार से जुड़े लोग गांव ही गांव की सड़कों से निकल कर पड़ोसी राज्य में घुस जाते हैं और शराब और डीजल भर कर ले आते

तलाशी सम्भव नहीं

आबकारी निरोधक दल व आबकारी विभाग के पास पर्याप्त स्टाफ के अभाव में बड़े शराब माफियाओं की धर-पकड़ संभव ही नहीं होती। पुख्ता सूचना के अभाव में बड़े वाहनों को राष्ट्रीय राजमार्गों पर रोककर उनकी तलाशी नहीं ली जा सकती। शराब के बड़े अवैध करोबारी वाहनों का राष्ट्रीय राजमार्गों से गुजारते समय आगे-पीछे वाहन लगाकर पूरी रैकी करते रहते हैं। पुलिस व आबकारी दल की अपेक्षा उनका सूचना तंत्र मजबूत होने से वे मार्ग बदल-बदल कर अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं और पुलिस हाथ मलते रह जाती है। तलाशी के दौरान कभी-कभाव वे पुलिस पर हमला करने से भी नहीं चूकते हैं।

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भाजपा सरकार पर शराब नीति को लेकर प्रहार करने वाली कांग्रेस शराब के अवैध कारोबारियों की सरपरस्त बनी हुई है। पड़ोसी राज्यों की तुलना में शराब पर वैट ज्यादा है। शराब महंगी होने से शराब के अवैध कारोबारियों की फौज बढ़ गई है। पुलिस व आबकारी दल के पास न तो स्टाफ है न पेट्रोलिंग के लिए संसाधन। पूरे राज्य में शराब कारोबारियों ने कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखा रखा है।- राजेन्द्र राठौड़, विधायक, तारानगर
आबकारी निरोधक दल शराब के अवैध कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। पुख्ता सूचना होने पर पूरी घेरे बंदी के साथ कार्रवाई की जाती है। किन्तु कारोबारियों का संचार तंत्र तेज है। फिर आम जनता भी अवैध कारोबारियों को पकड़वाने अथवा शराब के अवैध ठिकानों का पता बताने में साथ नहीं देती।- गोविन्द सिंह देवड़ा, उप निदेशक आबकारी निरोधक दलपुलिस ने शराब के अवैध कारोबारियों पर अंकुश के लिए थानेदारों को निर्देशित किया है। स्पेशल टीम भी बनाई है। पिछले एक सप्ताह में हुई कार्रवाई इसी का नतीजा है। संसाधन व स्टाफ का भी अभाव है। अब अवैध शराब के पकड़े जाने पर सिर्फ चालक के खिलाफ ही कार्रवाई करने के बजाय उसके असली मालिक को भी मुकदमें में नामजद किया जा रहा है।

- अनिल कयाल, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, चूरू

Wednesday, October 7, 2009

घड़साना की राह पर चूरू

आस पर भारी प्यास

पानी की गुहार में गले रूंदे

खेत-खलियान

चूरू, 6 अक्टूबर। पानी पर पार पाने के लिए चूरू अब घड़साना की राह पर है। सिंचित क्षेत्र के पानी पर अपने हक के लिए काश्तकारों ने आर-पार की लड़ाई का मानस बनाना शुरू कर दिया है। गांधी जयंती से इसका आगाज हो गया है। तारानगर पंचायत समिति के पुनसीसर गांव में जमा आस-पास के करीब दस-बारह गांवों के दो सौ काश्तकारों ने एकजुटता के साथ संकल्पित होकर अहिंसक तरीके से बड़ा जनआंदोलन छेडऩे की ठान ली है। किसान फिलहाल अपने क्षेत्र में संघर्ष समितियां गठित करने में जुट गए हैं। फसल कटाई के बाद सबसे पहले तारानगर से पानी के लिए जन आन्दोलन शुरू किया जाएगा। इसके बाद चूरू जिला मुख्यालय पर फिर बीकानेर और आखिर में राजधानी जयपुर में धरना-प्रदर्शन किए जाएंगे।किसानों का मानना है कि पानी की गुहार लगाते अब उनके गले रूंद गए हैं। खेत और खलियान पानी की बूंद-बूंद को प्यासे हैं।

नरेगा के चलते गांवों से पलायन कर काश्तकार दो वक्त की रोजी-रोटी का जुगाड़ कर पा रहा है, लेकिन पर्याप्त पानी के अभाव में घर बैठी आधी दुनियां, दम तोड़ती फसलें और पानी को तरसते मवेशियों की चिंता उनके मुंह का निवाला हलक में जाने नहीं देती।काश्तकार इसके लिए शासन और प्रशासन को ही दोषी मानते हंै। बकौल काश्तकार चूरूवासियों को पानी पीने और खेतों को सींचने के लिए अब तक जितनी भी योजनाएं बनी वे या तो अधूरी हैं या राजनीतिक अड़ंगेबाजी में सिरे नहीं चढ़ पा रही हैं।

काश्तकारों ने आंदोलन के पहले चरण में राज्य सरकार से चौधरी कुम्भाराम आर्य लिफ्ट नहर योजना से अविलम्ब रबी की फसल के लिए पानी उपलब्ध कराने की आवाज बुलंद की है। ग्रामीणों का आरोप है कि राज्य सरकार ने चुनावी घोषणा पत्र में उनसे वादा किया था कि वह रबी की फसल के लिए पानी मुहैया कराएंगी जबकि सरकार अब वादा खिलाफी कर रही है।

क्या है योजना

सन 1980 के दशक में बनी चौ। कुम्भाराम आर्य लिफ्ट नहर योजना के तहत करीब 107.8 किलोमीटर मुख्य नहर सहित करीब एक हजार किलोमीटर लम्बी व छोटी वितरिकाएं बनाई जानी थी। इससे लगभग दो लाख चालीस हजार हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के लिए करीब दो क्यूसेक पानी सालाना छोड़ा जाना प्रस्तावित था। सन 1984 में योजना के आरम्भ से लेकर अब तक गुजरे पच्चीस वर्षों में करीब 376 करोड़ रुपया खर्च हो चुका है जबकि योजना से जिले के किसानों को एक आने भर भी सिंचाई का लाभ नहीं मिल सका है। हालात तो यह है भविष्य में कब तक लाभ मिल सकेगा यह भी भविष्य के ही गर्भ में है जबकि नए सिंचित क्षेत्र भी खोले जाने प्रस्तावित हैं।

किसे मिलना है लाभ

चौधरी कुम्भाराम आर्य नहर योजना से हनुमानगढ़ जिले के टीबी, नोहर, भादरा तथा चूरू जिले सरदारशहर, व तारानगर विधानसभा क्षेत्रों के लाखों काश्तकारों को लाभ मिलना था। नहर रावतसर, हनुमानगढ़ कस्बे के धन्नासर कैचियां क्षेत्र से जीरो किलोमीटर से शुरू होकर तारानगर,चूरू के १०७ किलोमीटर पर अंतिम छोर तक पहुंचनी है।

क्या है मौजूदा स्थिति

योजना के तहत मुख्य नहर सहित करीब 483.56 किलोमीटर लम्बाई में वितरिकाएं बनाई जा चुकी हैं। इनसे करीब एक लाख दो हजार छह सौ बाइस हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई संभव हो सकती है। लेकिन चूरू जिले के तारानगर विधानसभा क्षेत्र स्थित रैयाटुण्डा, पुनरास, भूरावास, भांमरा व कैलाश माइनरों के हैड रेगूलेटरों के गेट लगाने शेष होने,इसके अलावा सरदारशहर विधानसभा क्षेत्र स्थित सूंई बांध के 17किलोमीटर पर करीब 26मीटर का एक खांचा पुल संभाल के लिए छोड़ दिए जाने। इसकी लाईनिंग शेष रहने से जिले के काश्तकारों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। बकौल राज्य सरकार यह कार्य इसी वर्ष में पूर्ण किया जाना प्रस्तावित है। इसके साथ ही नया सिंचित क्षेत्र भी खोला जाना प्रस्तावित है।

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कुम्भाराम नहर योजना राजनीतिक अड़ंगेबाजी में लम्बित है। किसान सिंचाई के लिए ही नहीं बल्कि पीने के पानी को भी तरस रहा है। सरकार ने जल्द सुनवाई नहीं की तो जन-आन्दोलन करेंगे।

- गजानंद तिवारी, काश्तकार, पुनसीसर

योजना के कार्य को पूरा कराने के लिए अब जो भी बलिदान देना होगा देंगे। योजना को बीस साल हो गए। अब इंतजार नहीं होता।

- तोलाराम शर्मा, काश्तकार, पुनसीसर

गांधी जयंती पर ही मीटिंग रखी थी। तारानगर विधायक राजेन्द्र राठौड़ को बुलाया था। गांव-गांव में घूम कर पानी के लिए संघर्ष समितियां बना रहे हैं। अब आर-पार की लड़ाई लड़ेंगे।

- नरसीराम, काश्तकार, मेहरासर उपाधियान

फण्ड मैच होना चाहिए पर्याप्त

धन उपलब्ध नहीं होने के कारण योजना की समयावधि बढ़ जाती है इससे लागत भी बढ़ जाती है। कुम्भाराम आर्य नहर योजना भी ऐसी ही स्थिति से गुजर रही है। जहां सौ करोड़ रुपया चाहिए वहां दस करोड़ रुपया मिल पाता है। इस हाल में तो योजना अगले बीस साल में भी पूरी होना मुश्किल है।

- कुलदीप विश्नोई, अधिशासी अभियंता, जलदाय विभाग, बीकानेर

कांग्रेस कर रही है पानी की राजनीति

पिछले चार दशक से कांग्रेस सिंचाई के पानी की राजनीति कर रही है। गहलोत सरकार ने काश्तकारों से सिंचित क्षेत्र में पानी देने का वादा किया था अब सरकार इससे मुकर गई है। सरकार की कथनी और करनी में अंतर है। वसुंधरा सरकार के समय जारी 14 करोड़ की निविदाएं गहलोत सरकार ने आते ही रोक दी। यही नहीं रबी फसल से पानी देने का भरोसा दर्शाकर प्रस्ताव जल वितरण समिति को प्र्र्र्रस्तुत कर दिया गया। इससे पानी मिलना और टल गया। योजना पर करोड़ों रुपया खर्च हो चुका है अब कुछ लाखों का काम बाकी है। इसे शीघ्र पूरा कराया जाना चाहिए। सरकार की किसान को राहत देने की नीयत ही नहीं है।

- राजेन्द्र राठौड़, विधायक तारानगर

गति बढ़ाए जाने के प्रयास हो रहे हैं

बांध में पानी की कमी के कारण कुछ शिथिलता आई है। सरकार के स्तर पर कुछ निर्णय भी होने है। काम की गति भी घीमी है, इससे नहर का डैमेज भी बढ़ रहा है। तमाम विषयों को ध्यान में रखते हुए योजना के शीघ्र ही पूरा होने के लिए उसकी गति बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए सरकार को लिखा जा रहा है।- डा। केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

Saturday, September 26, 2009

आखिर कब चमकेगा चूरू

कौन हैं शहर के ऐसे हालातों के जिम्मेदार?

चूरू, 25 सितम्बर। हैरिटेज सिटी चूरू की जीवंतता कही खो गई है। जिला मुख्यालय होते हुए भी लोग यहां कस्बाई आबोहवा का सा अहसास करते हैं। शहर में चहुं दिशाओं से प्रवेश के साथ किसी भी आगंतुक को यह महसूस ही नहीं होता कि कस्बे पीछे छूट गए हैं, उन्होंने जिला मुख्यालय में कदम रख दिया है। शहरी चमक-धमक, चहल-पहल, रंग-रौनक कहीं दिखाई नहीं देती। दशकों पुराना ताला जड़ी जर्जर हवेलियां, भरभराकर ध्वस्त होने को आतुर पुरानी इमारतें, दीमकचट पेड़ों के ठूंट, टूटी सड़कें, गंदा पानी उगलती नालियां, अतिक्रमण से अटे बाजार, बेतरतीब यातायात, गंदगी और दलदल से भरे जोहड़, गंदे पानी की निकासी के अभाव में दुर्गंध फैलाती गैनाणियां, बदबू युक्त वातावरण, जगह-जगह कचरे के ढेर, सांड़ों और आवारा मवेशियों का जमघट, गधागाडिय़ों की रेलमपेल, तेज धूप, धूल और धक्कड़ बरबस सोचने को मजबूर कर देता है कि इक्कीसवीं सदी में तेजी से अग्रसर जमाने में चूरू का ऐसा हाल क्यों?आखिर अब नहीं तो कब चमकेगा चूरू? क्या कारण रहे कि विकास की दौड़ में चूरू शहर पिछड़ गया, उपखण्ड आगे निकल गए? कौन हैं शहर के ऐसे हालातों के जिम्मेदार? शहर के नागरिकों का अपने शहर के प्रति कितना है योगदान?

सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में कहां रहता है झोल? आदि अनेक सवाल हैं जिनके जवाब हमें नई पीढ़ी को आज नहीं तो कल देने ही होंगे।राजस्थान पत्रिका ने जागो चूरू अभियान के मद्देनजर वार्ड एक से दस तक के क्षेत्रों पर एक नजर डाली तो हाल-ए-नजारा कुछ यूं दिखाई दिया। वार्ड एक में बच्चों के खेलने के लिए पार्क की आवश्यकता है। पार्क के अभाव में बच्चे सड़कों पर खेलते हैं। वार्ड दो में गुंसाई की समाधि के पास बनी गंदे पानी की गैनाणी और गलियों में झूलते विद्युत प्रवाहित तार वार्डवासियों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। वार्ड तीन में सड़क एवं नाली निर्माण की आवश्यकता के साथ पेयजल समस्या है। वार्ड को एक सामुदायिक भवन की भी दरकार है। वार्ड चार में बागला स्कूल का खेल मैदान गंदगी से अटा है, जोहरी सागर के पास गंदा पानी जमा है तथा वार्ड के निचले हिस्से में पेयजल की विकट समस्या है। अल्पसंख्यक बाहुल्य वाले वार्ड पांच में स्कूल का अभाव है। वार्ड छह में संचालित राजकीय विद्यालय नंबर 11 का जर्जर भवन गिरने के कगार पर है। बताया जाता है कि इस विद्यालय में पानी और बिजली का कनेक्शन भी नहीं है। वार्ड सात के लोग कम वोल्टेज और गंदे पानी की गैनाणी की समस्या से परेशान हैं। वार्ड आठ के लोग मस्जिद के निकट गंदगी और कचरे के ढेर से दुखी हंै। वार्ड नौ के लोग वर्षों पूर्व डाली गई पेयजल पाइप लाइन के पन्द्रह फीट नीचे चले जाने से पीडि़त हैं। वार्ड दस के लोगों को मच्छरों ने सता रखा है। वार्ड में जमा गंदे पानी के तालाब की समस्या से हर कोई परेशान है। वार्ड विकास के बारे में वार्डवाससियों से रू -ब-रू होते ही बरबस यही कहते हैं कि बिजली पानी का अभाव, टूटी सड़कें और नालियां से बहता गंदा पानी, ऊंची नीची सड़कें, जगह जगह लगे गंदगी के ढेरों जैसी सामान्य समस्या से उन्हें मुक्ति कब मिलेगी। यूं भी नहीं है कि नगर परिषद, जिला प्रशासन और वार्ड पार्षदों ने वार्डवासियों को इन समस्याओं से निजात दिलाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए, लेकिन प्रभावी कार्ययोजना एवं राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में शहर अब तक शहर दिखाई नहीं देने का दंश भोग रहा है।

Friday, July 3, 2009

बोर्ड का विकेन्द्रीकरण नहीं सुदृढ़ीकरण होगा

विधानसभा बाद बोर्ड का पुर्नगठन, ढाई हजार स्कूलों में अगस्त से कम्प्यूटर, शिक्षा-सन् २०१० में बदलेगा बोर्ड

चूरू, 3जुलाई। राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के विकेन्द्रीकरण की नहीं उसके सुदृढ़ीकरण की महती आवश्यकता है। राज्य सरकार विधानसभा सत्र समाप्त होने पर प्राथमिकता से बोर्ड का पुर्नगठन कर इस दिशा में ठोस कदम उठाएगी। शिक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल मेघवाल ने शुक्रवार को राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत में यह जानकारी दी।

शिक्षामंत्री ने अफसोस व्यक्त किया कि भाजपा शासन में बोर्ड अध्यक्ष पद पर बैठाए गए व्यक्ति की प्रशासनिक अनुभवहीनता के कारण परीक्षाओं में प्रश्नपत्र आउट होने जैसी घटनाएं हुईं और लाखों विद्यार्थियों को खामियाजा भुगतना पड़ा। अभिभावकों और बोर्ड प्रशासन को परेशानी हुई सो अलग।

उन्होंने कहा कि अब इस मामले में जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने से ज्यादा जरूरी है कि समूची व्यवस्था का ही सुदृढ़ीकरण किया जाए। शिक्षा मंत्री ने साफ तौर पर कहा कि बोर्ड का विकेन्द्रीकरण नहीं होगा। राजस्थान बोर्ड से संबद्ध विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर उसका सुदृढ़ीकरण जल्द से जल्द किया जाएगा। शिक्षामंत्री ने कहा कि प्रशासनिक व्यवस्थाओं में कहां-कहां बदलाव की आवश्यकता है? परीक्षा केन्द्रों पर निगरानी व्यवस्था कैसी हो? परीक्षा का स्वरूप कैसा हो? इन विषयों पर तेजी से चिंतन-मनन किया जा रहा है।इन प्रस्तावों को निर्णय के लिए केबिनेट में ले जाया जाएगा।

गौरतलब है कि अशोक गहलोत के पिछले शासनकाल में डा। पीसी व्यास के अध्यक्ष पद पर रहते बोर्ड के विकेन्द्रीकरण की दिशा में कदम उठाए गए थे। शिक्षामंत्री ने इस व्यवस्था को सिरे से ही नकार दिया। उन्होंने कहा कि विधानसभा सत्र समाप्त होने के तुरन्त बाद बोर्ड के पुर्नगठन के साथ ही तमाम नवाचारों पर भी अमल शुरू हो जाएगा। उन्होंने बताया कि शैक्षणिक और प्रशासनिक दोनों ही दृष्टि से मजबूत और अनुभवी व्यक्ति को बोर्ड अध्यक्ष बनाया जाएगा। इसकी तलाश जारी है। इसी के साथ ही सभी सदस्यों का भी मनोनयन कर दिया जाएगा। शिक्षा के राजनीतिकरण और भगवाकरण पर मास्टर भंवरलाल ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंंने कहा कि पाठ्यपुस्तकों पर काली स्याही पोतने जैसा काम उनकी सोच में नहीं है। उन्होंने इसे भाजपा की ही ओछी मानसिकता बताया। शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि वर्ष २०१० में नया पाठ्यक्रम लागू किया जाएगा। इस दौरान पाठ्यक्रम में अवांछित सामग्री को शिक्षाविदें से समीक्षा कराए जाने के बाद बदला जाएगा। शिक्षा मेंं नवाचार पर बात करते हुए उन्होंने अफसोस व्यक्त किया कि पूर्व शिक्षा मंत्री घनश्याम तिवाड़ी हो या प्रो।वासुदेव देवनानी सभी ने ऊपरी स्तर पर बड़ी-बड़ी बातें की पर जमीन पर कुछ नहीं किया। शिक्षा मंत्री ने बताया कि बीकानेर के चार ब्लॉक सहित राजस्थान के ३३ जिलों की करीब ढाई हजार उच्च प्राथमिक स्कूलों में एक अगस्त से कम्प्यूटर शिक्षा शुरू हो जाएगी। उन्होंने अपेक्षा की कि गांव के लोग रुचि लेकर इस यज्ञ में सहयोग करेंगे।

उन्होंने बताया कि यह प्रयोग सफल हुआ तो अगले चार सालों में सर्व शिक्षा अभियान से जुड़कर कक्षा छह से कम्प्यूटर शिक्षा शुरू कर दी जाएगी। इसी सत्र से पहली कक्षा में अंग्रेजी विषय को अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाने के नवाचार को उन्होंने वक्त की जरूरत बताया। शहरी क्षेत्र में अथवा रोड साईड की स्कूलों में सेवारत पंचायतीराज के कर्मचारियों को अगले दो माह में समानीकरण के तहत फिर से ग्रामीण स्कूलों में भेजे जाने पर उन्होंने दृढ़ता दर्शाई। शिक्षा मंत्री ने कहा कि संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने को ध्यान में रखते हुए उन्होंने करीब साढ़े तीन हजार शिक्षकों की रिक्तियों की पूर्ति के लिए वित्त विभाग को प्रस्ताव लिख भेजा है। इस दिशा में भी शीघ्र ही कार्रवाई होगी।

Sunday, February 22, 2009

बद अच्छा बदनाम बुरा

सन्तोष गुप्ता

भीलवाड़ा। बहुत पुरानी कहावत है बद अच्छा, बदनाम बुरा। मतलब यह कि खूबसूरती चेहरे के बजाय आचरण से पहचानी जाती है। यही बात विभागीय कामकाज के नजरिए से देखें तो विभाग भलें ही अच्छा हो उसका कार्य व्यवहार और कार्य संस्कृति ही उसके अच्छे और खराब होने का आईना होती है। पब्लिक डीलिंग से जुड़े महकमे अमूमन अपने कामकाज को लेकर ही बदनाम हैं। परिवहन महकमा भी उनसे अछूता नहीं। समय-समय पर ऐसे बहुत से किस्से प्रदेश भर में सामने आते रहे हैं जब चंद अवसरवादी और लालची कर्मचारियों की कारगुजारी से समूचे महकमे को शर्र्मिंदगी उठानी पड़ी है। वाहन चालकों का लाइसेंस जारी करना हो या वाहन परमिट, वाहन का फिटनेस देना हो या रजिस्ट्रेशन नम्बर कोई न कोई आरोप-प्रत्यारोप लगा ही है।बदनामी तो जैसे इस महकमे पर छाया की तरह उसके आगे चलती है। बेगूं के विधायक राजेन्द्रसिंह विधूड़ी को राह चलते दो सौ रुपए की सेवा बताने की घटना अखबारों की सुर्खियां क्या बनी लोगों को यह मानने और समझने में देर नहीं लगी कि ऐसा ही हुआ होगा। परिवहन महकमे के आला से लेकर अदने से अफसर ने भरे चौराहे शर्र्मिंदगी महसूस की। खाकी वर्दी का रंग और रुआब तो एसीबी के पाउडर लगे नोट की तरह धुलकर उतर गया। वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर वसूली के लक्ष्य पूरे करने को लेकर महकमे की कार्य व्यवस्था लडख़ड़ा गई। अब भले ही परिवहन महकमा सफाई में जो कहे उसकी साख पर आंच तो आ ही गई।कौन नहीं जानता राजनीति के हीरो विलेन के हाथों शिकस्त खा भी जाए तो अपने धनबल-भुजबल और छलबल से फिर प्रभाव जमाने में कसर नहीं छोड़ते। लोकतंत्र में लोकसेवक को कानून हाथ में लेने के यह अधिकार दिए किसने? अजमेर के पुलिस अधीक्षक पर विधायक के थप्पड़ की गूंज कई दिनों तक सुनी जाती रही। पीडब्ल्यूडी, विद्युत, जलदाय विभाग,नगर परिषद और न्यास के अभियंताओं व कर्मचारियों के साथ तो ऐसी बदसलूकी आम बात है। ऐसा लगता है सत्ता का मद सिर चढ़कर बोलने लगा। वरना बेगूं के विधायक भी इतने परेशान नहीं होते। ओवरलोड वाहनों की जांच हो या अवैध वाहनों की घरपकड़। यातायात पुलिस या परिवहन महकमे का जब भी अभियान चलता है तो सड़क पर जाम लगना तो आम बात होती है। आम आदमी तो जाम में चौतरफा पिस जाता है। श्रम,समय और र्ईंधन सभी गंवाना पड़ता है। लोकजीवन का यही यथार्थ है। लोक सेवक थोड़ा संयम और धैर्य का परिचय देते तो अवरुद्ध मार्ग उनके लिए सुगम और सहज होते देर नहीं लगती। यूं भी एक बात तो विचारणीय है कि आलीशान गाड़ी में सुरक्षागार्ड के साथ बैठे किसी भद्र पुरुष से भला कौन मूर्ख सेवा करवा कर अपनी और महकमे की भद पिटवाएगा। सत्य को कुछ समय के लिए झुठलाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। अब भले ही सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। परिवहन आयुक्त ने जांच भी शुरू कर दी है। घटना को लेकर प्रत्यक्षदर्शी भी सामने आने लगे हैं। जांच की सांच का खुलासा जब होगा तब होगा। तब तक परिवहन महकमा चौराहे पर शर्र्मिंदगी झेलता रहेगा। परिवहन महकमे को भी चाहिए कि वह अपनी कमजोरियों को भी जांचे। कामकाज में पारदर्शिता लाए। यदि उपनिरीक्षक का कहा सत्य पाया जाता है तो फिर बिना किसी दबाव के लोकसेवक और उसके फरमाबरदार के विरुद्ध भी वैसी ही विधि सम्मत कार्रवाई अमल में लाई जाए। सरकार को भी सोचना है। सत्ता के मद में चूर लोकसेवक भले जनता के काम करे न करे पर सार्वजनिक रूप से अपने आचार-व्यवहार से ऐसा कृत्य न हो जिससे लोकसेवक का मान और लोगों में वर्दी का विश्वास और रुआब कम न हो।

Thursday, January 8, 2009

खर्च का दुगना पाया सुख-3

पत्रिका समूह की सालाना समीक्षा बैठक में पहुंचने का आमंत्रण मिलने के दिन से ही यह सवाल दिमाग में कौंधने लगा कि भीलवाड़ा से कब निकला जाएगा? पुराना अनुभव है रातभर कामकर या सफर कर कॉन्फ्रें स में पहुंचते हैं तो फिर पूरे दिन नींद और आलस में बीत जाता है। तरोताजा नहीं रह पाते। इसलिए शाखा प्रबन्धक जगदीश गुप्ताजी से मैंने आग्रह किया कि हमें एक रात पहले ही पहुंचना चाहिए। हम रात्रि विश्राम जयपुर में ही करें तो बेहतर होगा, ताकि सुबह आठ बजे तक तैयार होकर पिंक पर्ल रिसोर्ट पहुंच सकेंगे।

गुप्ताजी ने भी आग्रह स्वीकार किया। हम छह जनवरी की रात्रि आठ बजे भीलवाड़ा से जयपुर के लिए प्रस्थान कर गए। भीलवाड़ा छोडऩे से पहले गुप्ताजी ने मालवीय नगर कॉलोनी स्थित पत्रिका के गेस्ट हाउस में कमरा बुक करा लिया था। हम सफर में थे। रास्ते में खाते-पीते, बातें करते समय कटने का पता ही न चला। करीब साढ़े बारह बजे हमारी कार पिंक पर्ल रिसोर्ट के बाहर से गुजरी। मेरे दिमाग की घंटी बजी। मन ने कुछ कहना शुरू किया। मन कह रहा था कि जहां पहुंचना है वह स्थल तो आ गया, आगे कहां जा रहे हो? मैंने मन की आवाज सुनी और अपना विचार मैनेजर गुप्ता जी के सम्मुख रख दिया।पत्रकारिता में एक सूत्र यह भी है कि विचारों की भ्रूण हत्या न की जाए। जब भी विचार उपजे उसे कागज पर लिखें अथवा अपने सहयोगियों में साझा कर दें। कहीं कोई अच्छी खबर पक जाए। इस सूत्र के कई बार अच्छे परिणाम मिले हैं ऐसा मेरा अनुभव रहा है। उस रात भी ऐसा ही हुआ। जैसे ही मैनेजर साहब को मैंने कहा कि हमें जयपुर जाकर पत्रिका के गेस्ट हाउस में ठहरना ही है। क्यों नहीं हम एक बार रिसोर्ट के रिशेप्शन पर पता कर लें कि क्या हम आज रात से ही वहां ठहर सकते हैं? मैनेजर साहब एक बार तो तैयार नहीं हुए। हमारी गाड़ी करीब एक किलोमीटर आगे निकल चुकी थी। फिर उन्होंने कहा कि चलो ठीक है, आप ही अन्दर जाकर बात करना। मैंने तुरन्त ड्राईवर को गाड़ी मोडऩे के लिए कहा। अगले पांच मिनट में मैं पिंक पर्ल रिसोर्ट के रिशेप्शन पर था। मैंने अपना परिचय दिया और उनसे पूछा कि क्या मेरे नाम से कोई बुकिंग हैं। रिशेप्शन पर बैठे व्यक्ति ने पूरे शिष्टïाचार के साथ जैसे होटल में आगंतुक का स्वागत करते हैं बताया कि मेरे नाम से कमरा बुक है। मुझे यह भी कहा गया कि घड़ी के अनुसार रात्रि के एक बज चुके हैं। यानि सात जनवरी लग चुकी है। मैं चाहूं तो उस वक्त से ही अपने लिए बुक कराए कमरे का उपभोग कर सकता हूं। रिशेप्शन पर बैठे व्यक्ति के मुख से अपने लिए पूरी तरह अनुकूल जवाब सुनकर मेरा मन नाचने लगा। सफर की सारी थकान चुटकियों में गायब हो गई। मैंने बाहर आकर मैनेजर साहब को बताया कि हम अब जयपुर नहीं जाएंगे। रिसोर्ट में ही रात्रि विश्राम करेंगे। हमारे लिए बुक कराए कमरों का समय शुरू हो चुका है। यानी एक दिन के खर्च पर हम रिसोर्ट में दो रात और दो दिन का लुत्फ उठा सकते हैं। इस सूझबूझ के लिए मैनेजर साहब भी खुश हुए। मुझे सुकून मिला कि अब सुबह जल्दी उठकर तैयार होने की जल्दबाजी नहीं रहेगी। खर्च से दुगुना सुख पाने मौज-मस्ती करने का आनन्द दूसरे नहीं उठा सकेंगे।(एक से तीन इति)-सन्तोष गुप्ता सम्पादकीय प्रभारी,भीलवाड़ा

शर्र्मींदगी अनजानी! -2

मुझे शर्र्मींदगी है। अनजानी शर्र्मींदगी। यह मेरी अंतश्चेतना की है। मैं जानता हूं जिस घटना पर मैं शर्र्मींदा हूं उसकी उन्हें खबर भी न होगी। वे बहुत सहज हैं। अत्यंत सहृदय भी। मेरे लिए वे परम आदरणीय हैं और मेरे उज्ज्वल भविष्य के जनक भी। उनकी सरलता का कोई सानी नहीं। करीब आठ साल बाद पिंक पर्ल रिसोर्ट में डिनर पर उनसे मुलाकात हुई। मुलाकात क्या हुई, साक्षात हुआ। मेरा अभिवादन स्वीकार करते ही उन्होंने मुझे नाम से संबोधित करते हुए कुशलक्षेम पूछी। मैं चकित रह गया। इतने वर्र्षों में मेरा रंग-रूप, काया-चेहरा सब बदल चुका है। बदन पर मोटापा झलकने लगा है। पेट बाहर आ गया है। चेहरे ने गंभीरता ओढ़ ली है। मेरी अल्हड़ता और मुस्कान मुझे ही सौतेली लगनी लगी है। ऐसे में उनका मुझे न सिर्फ पहचान पाना, बल्कि उतनी ही आत्मीयता और सहजता से आगे होकर संवाद कायम करना मेरे मन में उनके प्रति आदरभाव को और बढ़ा गया। यह मेरे लिए ऐसा था जैसे स्वजनों की भीड़ में किसी खास अपने को खोजते नन्हें बच्चे को अचानक कोई स्नेहभाव से बाजुओं से पकड़कर गोद में उठा ले। मैं तो उनके अपनेपन का वैसे ही कायल था। पत्रिका अजमेर संस्करण का शुभारंभ करने की तैयारियों के दिनों में उपयुक्त भवन अथवा भूखण्ड की तलाश के वक्त उनसे पहली मुलाकात हुई थी। इस काम के लिए बनी विशेष टास्क टीम में मैं भी था। मैंने ही तीन-चार भूखण्ड और भवन के प्रस्ताव जुटाकर मुख्यालय भिजवाए थे। जिन्हें देखने स्वयं महाप्रबंधक एचपी तिवारीजी अजमेर पहुंचे थे। अत्यंत साधारण स्वभाव के धनी तिवारीजी ने पहली ही मुलाकात में मेरे अंतर्मन में जगह बना ली थी। अजमेर से विदा होते हुए मैंने बस स्टैण्ड के सामने जिस पान की दुकान से उन्हें पान खिलाया वहीं पर ही अजमेर संस्करण के लिए भवन की तलाश पूरी हुई। पान की दुकान पर खड़े मित्र ने ही मुझे श्री तिवारीजी के लौटने पर बताया कि रीको औद्योगिक क्षेत्र में रीको का ही गोदाम बिकाऊ है। जिस पर शैड और भवन दोनों ही बने हुए हैं। हमें तो सिर्फ मशीन लगानी है और अखबार निकलने लगेगा। मैंने मित्र की बात सुनकर अपना माथा पीटा। अफसोस किया कि यह बात वह तनिक भी पहले बता देता तो में अभी ही तिवारीजी को साथ ले जाकर मौका भी दिखा लाता। खैर जो बात मेरे वश में नहीं थी उसके लिए मुझे अफसोस नहीं करना चाहिए यह सोचकर मैंने अगले दिन इसकी पूरी पड़ताल कर ही तिवारीजी को सूचित करने का मानस बनाया। मुझे प्रसन्नता है कि सिर्फ उपयुक्त स्थान की तलाश पूरी होने की वजह से ही अजमेर संस्करण मात्र तीन माह में शुरू हो गया। संस्करण के स्थापना दिवस समारोह में मुझे मेरे इस सहयोग और श्रम के लिए संस्थान की ओर से सम्मानित किया गया। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी के हाथों मुझे शॉल ओढ़ाया गया। संस्थान के लिए जी-जान से किए गए छोटे से काम का इतना बड़ा मान पाकर मैं स्वयं को संस्थान का ऋणी पाने लगा। तब से आज दिन तक अपने स्वभाव और सरोकार के बूते संस्थान में अपना स्थान बनाया। आज मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता हूं। उच्च आदर्श और व्यक्तित्व के धनी तिवारीजी से जुड़ी एक घटना ने ही मुझे भीतर तक हिलाकर रख दिया। जिस पर मैं मन ही मन शर्र्मींदगी महसूस करता हूं। घटना आठ जनवरी 09 की है। पिंक पर्ल रिसोर्ट के कमरा नम्बर 401 में मैं अपने दो साथियों अमित शर्मा मार्केटिंग प्रभारी और वितरण प्रभारी अमित के साथ ठहरा हुआ था। कमरे में इंस्टेंट चाय का प्रावधान था। लेकिन पाउडर दूध और चाय के पाउच पर्याप्त नहीं थे। उपलब्ध पाउच से सिर्फ एक चाय ही बन सकती थी। और हम तीन जने थे। सुबह आठ बजे कॉन्फ्रेस हॉल में एकत्र होने की हमें जल्दी थी। हमें बताया गया था कि कॉन्फ्रेस में देरी से पहुंचे तो किसी भी रूप में दण्डित किए जा सकते हो! थ्री स्टार होटल के कमरे में चाय और अखबार के बिना दैनिक क्रिया से निवृत्त होना मुश्किल लग रहा था। रूम अटेंडेंट ने एक प्याला चाय की कीमत साठ रुपए और सिगरेट के एक पैकट की कीमत सौ रुपए बताई थी। हमने कमरे में चाय मंगाने के बजाय बनाना ही उचित समझा। मैंने चाय और दूध के वांछित पाउच उपलब्ध कराने का ऑर्डर कर अपने लिए चाय बना ली। चाय की प्याली हाथ में लिए मैं पलंग पर बैठा चुस्की भर रहा था। डेली न्यूज का ताजा अंक पढऩे में मशगूल था। दाएं हाथ की अंगुली में सिगरेट सुलग रही थी। यह मेरे पास उपलब्ध कोटे में से बची इकलौती सिगरेट थी। होटल के कमरे में बैठे बेफिक्र इस इकलौती सिगरेट का सुट्टा लगाने का आनन्द अलग ही था। मैं यदि ये कहूं आनन्द की इस अनुभूति को बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि लाखों की लागत से बनाए अपने घर में मुझे ऐसा मौका अभी तक नहीं मिला। तभी अचानक कमरे का दरवाजा नोक हुआ। मैंने बिना विचारे ही यह जानकर कि रूम अटेंडेंट होगा अन्दर आने को कह दिया। दरवाजा खुला तो मेरे होश फाख्ता हो गए। मैं स्तब्ध रह गया। दिमाग ने तो जैसे काम करना ही बंद कर दिया। सोच और समझ सुन्न हो गई। पलंग पर बैठे मुझे लगा कि किसी ने मेरे पर घड़ा भर कर बर्फीला पानी उड़ेल दिया। मेरी खुली आंखों के सामने जो आकृति दिखाई पड़ रही थी वह तिवारीजी की थी। उन्होंने मुझसे पूछा क्या बाथरूम खाली है? मैंने कहा नहीं। और दरवाजा बंद हो गया। एक पल को ऐसा लगा कि आनन्द के इन क्षणों में भगवान देखने आए और अंर्तध्यान हो गए। दूसरे ही पल अहसास हुआ कि यह कैसा आनन्द? इस आनन्द से तो उनकी नजरों में मेरी छवि प्रभावित हो गई होगी? ऐसे हालात में पाया गया हूं जिसकी उन्हें उम्मीद न होगी? फिर खयाल आया कि बाथरूम खाली पूछने के बहाने वे कहीं हमें जांचने ही तो नहीं आए थे? इस घटना का खयाल आने पर अब तक मैं अपने आप को सहज नहीं कर पाता हूं। सोचता हूं कॉन्फ्रेंस में समय पर पहुंचने की उनकी भी मजबूरी होगी। अन्यथा वे खाली बाथरूम तलाशने हमारे कमरे में क्यों आते? फिर भी मैं अंतश्चेतना से शर्मींदगी महसूस करने लगा हूं। बंद कमरे में भी सतर्कता बरतने लगा हूं। सिगरेट पीने की खुद की कमजोरी से डरने लगा हूं। कमजोरी पर जीत का प्रयत्न और प्रार्थना करने लगा हूं।

Wednesday, January 7, 2009

लम्हे जो याद बन गए...

खुशी के अलफाज नहीं-1

भीलवाड़ा संस्करण सम्पादकीय प्रभारी पद दायित्व संभाले मुझे अभी चार माह ही पूरे हुए। पत्रिका समूह की सालाना समीक्षा बैठक में हिस्सा लेने का मौका मिला। बैठक सात और आठ जनवरी को जयपुर के निकट पिंक पर्ल रिसोर्ट में रखी गई थी। पत्रिका समूह के निदेशक मण्डल सदस्यों, शाखा प्रबन्धकों व सम्पादकीय प्रभारियों का एक स्थान पर एक छत के नीचे दो दिन एक साथ रहना अपने आप में उत्साहजनक था। मेरे लिए यह पहला अवसर था। इसे लेकर मुझ में थोड़ी घबराहट भी थी। मानवीय स्वभाववश ऐसा होना लाजिमी भी था। अजमेर से पदोन्नति पर भीलवाड़ा पदस्थापन के नए दायित्व बोध के साथ यह नायाब अनुभव होने वाला था। सोचता था कि निदेशक मण्डल के सदस्यों से मुलाकात कैसी होगी? नए पद पर मेरे कामकाज का मूल्यांकन कैसा रहा होगा? हालांकि नई ऊर्जा और ऊष्मा से मैं लबरेज था। फिर भी संदेह पनप रहा था। भीलवाड़ा में नया पद, नई जगह, नए साथी, सब कुछ मेरे लिए नया था। विधानसभा चुनाव सिर पर थे। अनजाने लोगों में वर्चस्व बनाना, साथियों पर नेतृत्व कायम कर पाना मेरे लिए चुनौती थी। मेरे स्वभाव, मेरी कार्य दक्षता और मेरे आत्मविश्वास ने यह काम कब कर दिया मुझे खुद तब अनुभूत हुआ, जब कार्यकारी प्रबन्ध निदेशक आदरणीय नीहार जी सा. ने मुझसे कहा (भीलवाड़ा ठीक चल रहा है, मुझे जानकारी है। अच्छा फीडबैक मिला है।) नीहारजी के इस कथन में न जाने कैसी जादूई झप्पी थी कि मेरा अन्तर्मन पुलकित हो गया। मैंने तो अभी उनसे विनम्र नमस्कार ही किया था। मुख से कुछ बोला ही नहीं। मेरे होठों पर आए शब्द प्रस्फुटित होते इससे पहले ही बुलबुले बन गायब हो गए। मुझे परीक्षा में उत्तीर्ण होने सा अहसास हुआ। दिल बल्लियों उछल रहा था। मन कुलांचे भर रहा था। मेरे पास भीतर-भीतर होती खुशी को दर्शाने के लिए अलफाज नहीं थे। उस क्षण मुस्करा कर मैं सिर्फ थैंक्यू ही कह पाया

शर्र्मींदगी अनजानी! -2
मुझे शर्र्मींदगी है। अनजानी शर्र्मींदगी। यह मेरी अंतश्चेतना की है। मैं जानता हूं जिस घटना पर मैं शर्र्मींदा हूं उसकी उन्हें खबर भी न होगी। वे बहुत सहज हैं। अत्यंत सहृदय भी। मेरे लिए वे परम आदरणीय हैं और मेरे उज्ज्वल भविष्य के जनक भी। उनकी सरलता का कोई सानी नहीं। करीब आठ साल बाद पिंक पर्ल रिसोर्ट में डिनर पर उनसे मुलाकात हुई। मुलाकात क्या हुई, साक्षात हुआ। मेरा अभिवादन स्वीकार करते ही उन्होंने मुझे नाम से संबोधित करते हुए कुशलक्षेम पूछी। मैं चकित रह गया। इतने वर्र्षों में मेरा रंग-रूप, काया-चेहरा सब बदल चुका है। बदन पर मोटापा झलकने लगा है। पेट बाहर आ गया है। चेहरे ने गंभीरता ओढ़ ली है। मेरी अल्हड़ता और मुस्कान मुझे ही सौतेली लगनी लगी है। ऐसे में उनका मुझे न सिर्फ पहचान पाना, बल्कि उतनी ही आत्मीयता और सहजता से आगे होकर संवाद कायम करना मेरे मन में उनके प्रति आदरभाव को और बढ़ा गया। यह मेरे लिए ऐसा था जैसे स्वजनों की भीड़ में किसी खास अपने को खोजते नन्हें बच्चे को अचानक कोई स्नेहभाव से बाजुओं से पकड़कर गोद में उठा ले। मैं तो उनके अपनेपन का वैसे ही कायल था। पत्रिका अजमेर संस्करण का शुभारंभ करने की तैयारियों के दिनों में उपयुक्त भवन अथवा भूखण्ड की तलाश के वक्त उनसे पहली मुलाकात हुई थी। इस काम के लिए बनी विशेष टास्क टीम में मैं भी था। मैंने ही तीन-चार भूखण्ड और भवन के प्रस्ताव जुटाकर मुख्यालय भिजवाए थे। जिन्हें देखने स्वयं महाप्रबंधक एचपी तिवारीजी अजमेर पहुंचे थे। अत्यंत साधारण स्वभाव के धनी तिवारीजी ने पहली ही मुलाकात में मेरे अंतर्मन में जगह बना ली थी। अजमेर से विदा होते हुए मैंने बस स्टैण्ड के सामने जिस पान की दुकान से उन्हें पान खिलाया वहीं पर ही अजमेर संस्करण के लिए भवन की तलाश पूरी हुई। पान की दुकान पर खड़े मित्र ने ही मुझे श्री तिवारीजी के लौटने पर बताया कि रीको औद्योगिक क्षेत्र में रीको का ही गोदाम बिकाऊ है। जिस पर शैड और भवन दोनों ही बने हुए हैं। हमें तो सिर्फ मशीन लगानी है और अखबार निकलने लगेगा। मैंने मित्र की बात सुनकर अपना माथा पीटा। अफसोस किया कि यह बात वह तनिक भी पहले बता देता तो में अभी ही तिवारीजी को साथ ले जाकर मौका भी दिखा लाता। खैर जो बात मेरे वश में नहीं थी उसके लिए मुझे अफसोस नहीं करना चाहिए यह सोचकर मैंने अगले दिन इसकी पूरी पड़ताल कर ही तिवारीजी को सूचित करने का मानस बनाया। मुझे प्रसन्नता है कि सिर्फ उपयुक्त स्थान की तलाश पूरी होने की वजह से ही अजमेर संस्करण मात्र तीन माह में शुरू हो गया। संस्करण के स्थापना दिवस समारोह में मुझे मेरे इस सहयोग और श्रम के लिए संस्थान की ओर से सम्मानित किया गया। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी के हाथों मुझे शॉल ओढ़ाया गया। संस्थान के लिए जी-जान से किए गए छोटे से काम का इतना बड़ा मान पाकर मैं स्वयं को संस्थान का ऋणी पाने लगा। तब से आज दिन तक अपने स्वभाव और सरोकार के बूते संस्थान में अपना स्थान बनाया। आज मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता हूं। उच्च आदर्श और व्यक्तित्व के धनी तिवारीजी से जुड़ी एक घटना ने ही मुझे भीतर तक हिलाकर रख दिया। जिस पर मैं मन ही मन शर्र्मींदगी महसूस करता हूं। घटना आठ जनवरी 09 की है। पिंक पर्ल रिसोर्ट के कमरा नम्बर 401 में मैं अपने दो साथियों अमित शर्मा मार्केटिंग प्रभारी और वितरण प्रभारी अमित के साथ ठहरा हुआ था। कमरे में इंस्टेंट चाय का प्रावधान था। लेकिन पाउडर दूध और चाय के पाउच पर्याप्त नहीं थे। उपलब्ध पाउच से सिर्फ एक चाय ही बन सकती थी। और हम तीन जने थे। सुबह आठ बजे कॉन्फ्रेस हॉल में एकत्र होने की हमें जल्दी थी। हमें बताया गया था कि कॉन्फ्रेस में देरी से पहुंचे तो किसी भी रूप में दण्डित किए जा सकते हो! थ्री स्टार होटल के कमरे में चाय और अखबार के बिना दैनिक क्रिया से निवृत्त होना मुश्किल लग रहा था। रूम अटेंडेंट ने एक प्याला चाय की कीमत साठ रुपए और सिगरेट के एक पैकट की कीमत सौ रुपए बताई थी। हमने कमरे में चाय मंगाने के बजाय बनाना ही उचित समझा। मैंने चाय और दूध के वांछित पाउच उपलब्ध कराने का ऑर्डर कर अपने लिए चाय बना ली। चाय की प्याली हाथ में लिए मैं पलंग पर बैठा चुस्की भर रहा था। डेली न्यूज का ताजा अंक पढऩे में मशगूल था। दाएं हाथ की अंगुली में सिगरेट सुलग रही थी। यह मेरे पास उपलब्ध कोटे में से बची इकलौती सिगरेट थी। होटल के कमरे में बैठे बेफिक्र इस इकलौती सिगरेट का सुट्टा लगाने का आनन्द अलग ही था। मैं यदि ये कहूं आनन्द की इस अनुभूति को बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि लाखों की लागत से बनाए अपने घर में मुझे ऐसा मौका अभी तक नहीं मिला। तभी अचानक कमरे का दरवाजा नोक हुआ। मैंने बिना विचारे ही यह जानकर कि रूम अटेंडेंट होगा अन्दर आने को कह दिया। दरवाजा खुला तो मेरे होश फाख्ता हो गए। मैं स्तब्ध रह गया। दिमाग ने तो जैसे काम करना ही बंद कर दिया। सोच और समझ सुन्न हो गई। पलंग पर बैठे मुझे लगा कि किसी ने मेरे पर घड़ा भर कर बर्फीला पानी उड़ेल दिया। मेरी खुली आंखों के सामने जो आकृति दिखाई पड़ रही थी वह तिवारीजी की थी। उन्होंने मुझसे पूछा क्या बाथरूम खाली है? मैंने कहा नहीं। और दरवाजा बंद हो गया। एक पल को ऐसा लगा कि आनन्द के इन क्षणों में भगवान देखने आए और अंर्तध्यान हो गए। दूसरे ही पल अहसास हुआ कि यह कैसा आनन्द? इस आनन्द से तो उनकी नजरों में मेरी छवि प्रभावित हो गई होगी? ऐसे हालात में पाया गया हूं जिसकी उन्हें उम्मीद न होगी? फिर खयाल आया कि बाथरूम खाली पूछने के बहाने वे कहीं हमें जांचने ही तो नहीं आए थे? इस घटना का खयाल आने पर अब तक मैं अपने आप को सहज नहीं कर पाता हूं। सोचता हूं कॉन्फ्रेंस में समय पर पहुंचने की उनकी भी मजबूरी होगी। अन्यथा वे खाली बाथरूम तलाशने हमारे कमरे में क्यों आते? फिर भी मैं अंतश्चेतना से शर्मींदगी महसूस करने लगा हूं। बंद कमरे में भी सतर्कता बरतने लगा हूं। सिगरेट पीने की खुद की कमजोरी से डरने लगा हूं। कमजोरी पर जीत का प्रयत्न और प्रार्थना करने लगा हूं।

खर्च का दुगना पाया सुख-3
पत्रिका समूह की सालाना समीक्षा बैठक में पहुंचने का आमंत्रण मिलने के दिन से ही यह सवाल दिमाग में कौंधने लगा कि भीलवाड़ा से कब निकला जाएगा? पुराना अनुभव है रातभर कामकर या सफर कर कॉन्फ्रें स में पहुंचते हैं तो फिर पूरे दिन नींद और आलस में बीत जाता है। तरोताजा नहीं रह पाते। इसलिए शाखा प्रबन्धक जगदीश गुप्ताजी से मैंने आग्रह किया कि हमें एक रात पहले ही पहुंचना चाहिए। हम रात्रि विश्राम जयपुर में ही करें तो बेहतर होगा, ताकि सुबह आठ बजे तक तैयार होकर पिंक पर्ल रिसोर्ट पहुंच सकेंगे।
गुप्ताजी ने भी आग्रह स्वीकार किया। हम छह जनवरी की रात्रि आठ बजे भीलवाड़ा से जयपुर के लिए प्रस्थान कर गए। भीलवाड़ा छोडऩे से पहले गुप्ताजी ने मालवीय नगर कॉलोनी स्थित पत्रिका के गेस्ट हाउस में कमरा बुक करा लिया था। हम सफर में थे। रास्ते में खाते-पीते, बातें करते समय कटने का पता ही न चला। करीब साढ़े बारह बजे हमारी कार पिंक पर्ल रिसोर्ट के बाहर से गुजरी। मेरे दिमाग की घंटी बजी। मन ने कुछ कहना शुरू किया। मन कह रहा था कि जहां पहुंचना है वह स्थल तो आ गया, आगे कहां जा रहे हो? मैंने मन की आवाज सुनी और अपना विचार मैनेजर गुप्ता जी के सम्मुख रख दिया।पत्रकारिता में एक सूत्र यह भी है कि विचारों की भ्रूण हत्या न की जाए। जब भी विचार उपजे उसे कागज पर लिखें अथवा अपने सहयोगियों में साझा कर दें। कहीं कोई अच्छी खबर पक जाए। इस सूत्र के कई बार अच्छे परिणाम मिले हैं ऐसा मेरा अनुभव रहा है। उस रात भी ऐसा ही हुआ। जैसे ही मैनेजर साहब को मैंने कहा कि हमें जयपुर जाकर पत्रिका के गेस्ट हाउस में ठहरना ही है। क्यों नहीं हम एक बार रिसोर्ट के रिशेप्शन पर पता कर लें कि क्या हम आज रात से ही वहां ठहर सकते हैं? मैनेजर साहब एक बार तो तैयार नहीं हुए। हमारी गाड़ी करीब एक किलोमीटर आगे निकल चुकी थी। फिर उन्होंने कहा कि चलो ठीक है, आप ही अन्दर जाकर बात करना। मैंने तुरन्त ड्राईवर को गाड़ी मोडऩे के लिए कहा। अगले पांच मिनट में मैं पिंक पर्ल रिसोर्ट के रिशेप्शन पर था। मैंने अपना परिचय दिया और उनसे पूछा कि क्या मेरे नाम से कोई बुकिंग हैं। रिशेप्शन पर बैठे व्यक्ति ने पूरे शिष्टïाचार के साथ जैसे होटल में आगंतुक का स्वागत करते हैं बताया कि मेरे नाम से कमरा बुक है। मुझे यह भी कहा गया कि घड़ी के अनुसार रात्रि के एक बज चुके हैं। यानि सात जनवरी लग चुकी है। मैं चाहूं तो उस वक्त से ही अपने लिए बुक कराए कमरे का उपभोग कर सकता हूं। रिशेप्शन पर बैठे व्यक्ति के मुख से अपने लिए पूरी तरह अनुकूल जवाब सुनकर मेरा मन नाचने लगा। सफर की सारी थकान चुटकियों में गायब हो गई। मैंने बाहर आकर मैनेजर साहब को बताया कि हम अब जयपुर नहीं जाएंगे। रिसोर्ट में ही रात्रि विश्राम करेंगे। हमारे लिए बुक कराए कमरों का समय शुरू हो चुका है। यानी एक दिन के खर्च पर हम रिसोर्ट में दो रात और दो दिन का लुत्फ उठा सकते हैं। इस सूझबूझ के लिए मैनेजर साहब भी खुश हुए। मुझे सुकून मिला कि अब सुबह जल्दी उठकर तैयार होने की जल्दबाजी नहीं रहेगी। खर्च से दुगुना सुख पाने मौज-मस्ती करने का आनन्द दूसरे नहीं उठा सकेंगे।(एक से तीन इति)-सन्तोष गुप्ता सम्पादकीय प्रभारी,भीलवाड़ा