दोस्तों, आज मैं खुश हूं। यह खुशी आपसे मुलाकात की है। इस मुलाकात के लिए मैं पिछले लम्बे समय से चाहत रख रहा था। चाहत अब से चंद सैकंड पहले ही पूरी हुई। अगले हर पल आप लोगों का सुखद सान्निध्य पाता रहूं ऐसी कामना है। मैं चाहता हूं कि मैंने अब तक जो किया, जो मैं कर रहा हूं और जो मैं करना चाहता हूं। उसे ब्लॉग के जरिए आप सभी से साझा कर सकूं। मुझ में हर नए दिन की शुरुआत के साथ कुछ नया करने की ललक रहती है। उसे शिद्दत से पूरा करने की जद्दोजहद में हर दिन करना होता है...सच का सामना। ये ब्लॉग ऐसी ही सच्चाइयों से अब आपकों भी कराता रहेगा रू-ब-रू।

Monday, June 21, 2010

पापा बहुत याद आते हो....


सन्तोष गुप्ता
मैं जब भी आपके पोते कुक्कू को समझाता हूं पापा आप बहुत याद आते हो। मुझे ठीक से याद नहीं क्या मुझे लेकर आप भी ऐसे ही तनावग्रस्त रहा करते थे? जैसे आज मैं रहता हूं? उसके प्रति चिंता मेरी कभी खत्म होगी कि नहीं मैं नहीं जानता। बस इतना जानता हूं कि आज वह अठारह बरस का होने को है उसके भविष्य को लेकर मैं अब तक आश्वस्त नहीं हो सका हूं। बड़ा होकर वह क्या बनेगा? आगे चलकर वह क्या करेगा? जानता हूं भाग्य उसका है पर परवरिश तो मेरी है ना पापा? मैं उसकी परवरिश में कोई कमी नहीं रख रहा फिर भी चिन्तामुक्त नहीं हो पाता। ऐसा क्यों है पापा?
पापा शायद आपको याद हो आपके रहते मैं भी दो बच्चों का पिता बन गया था। पिता बनने की खुशी कैसी होती है मैंने उस दिन जान लिया था। आप भी तो दादा होने पर मुझ से कही अधिक पुलकित थे। आपके दुलार- प्यार में ही कुक्कू घुटने चलता हुआ घर की सीढिय़ां चढऩे लगा था। आप उस पर नजर रखा करते थे। उसके लडख़ड़ाने या फिसलने से पहले ही आपका मजबूत हाथ उसे थामने को तैयार रहता था। घर के ऊपर माले पर उसके ताऊ थे और नीचे आप? पापा आपकी मौजूदगी मैं मुझे उसकी सुरक्षा की तनिक भी चिन्ता नहीं थी। आपका साया मुझे धूप में भी छांव का अहसास कराता था। कठिन वक्त में भी मुझे सहज बना देता था। मैं तो उन दिनों खुद स्वावलम्बन की डगर पर था। नव विवाहित जीवन की कई उतार-चढ़ाव वाली राह पर आप ही मेरा सम्बल बन जाया करते थे। हाथों में छोटी सी पगार पाकर मैं तो बैचेन हो जाता था। उस पगार में से एक चौथाई हिस्सा आपको घर खर्च का जो देना होता था। कई बार में संकोच कर बैठता था। आप भी मुझ से नाराज हो जाते थे पर मुंह से कहते कुछ नहीं। मैं ही आपके चेहरे से आपके मन के भाव पढ़ लिया करता था। मेरे ऐसे व्यवहार से आपको कितनी तकलीफ होती होगी ना पापा?
आज मैं ही नहीं तुम्हारी बहू भी कमाती है। मैं पूरी पगार मकान के कर्ज में चुका देता हूं। वो अपनी पगार से घर का खर्च उठाती है। अब तो आपका पोता ही नहीं पोती तनू भी चौदह बरस की हो गई है। चार की थी वो जब आप उसकी नन्हीं हथेली से धीरे से अपनी अंगुली छुड़ाकर उससे बहुत दूर आसमान का तारा बन बैठे थे। आपने तो उसका न हंसना सुना न नाचना देखा। अब तो वो नन्हें हाथों से मुलायम और पतली चपाती भी बनाने लगी है। दादी के हाथों अपने बालों में कंघी करवाते वो आपको याद कर लिया करती है। मेरे बच्चों की दादी ठीक से है पापा। पर वो मेरे बच्चों के पास नहीं रहती। उसका मन भी वहां लगता है जहां आपका पलंग लगा करता था। आपके सबसे छोटे को लेकर उसकी चिंता अभी मिटी नहीं जिसका घर बसाने की चिंता में आप मिट गए पापा। छोटे का ख्याल मुझे भी व्यथित करता है। पर मैं भी क्या करूं उसकी अधूरी शिक्षा और तंगहाली उसमें पनपने नहीं देती खुशहाली। आपकी दी छत के नीचे अभी वो महफूज है। आपको शायद याद न हो आपने जिस जमीन पर मेरे मकान की नींव रखी थी उसी छत के नीचे अब मेरा भी सुकून है पापा। पर अब न आप मेरे पास हो और न मैं मेरे परिवार के साथ? भाग्य का ये कैसा खेल है पापा?
पापा आपका ख्याल आते ही मेरा शरीर ऊर्जावान हो जाता है। अन्र्तमन गर्व और फख्र्र से खिल उठता है। आपके स्नेहिल स्पर्श का एहसास रोम-रोम में नवीन उष्मा का संचार कर देता है। ऐसा लगता है मानों आसमान की ऊंचाई और सागर की गहराई नापने की ताकत मुझमें आ गई। आज आप साक्षात मेरे पास नहीं तो क्या मेरे अन्तर्मन में तो बसे हो। एक संतान के लिए पिता का होना शब्दों में तो बांधा नहीं जा सकता। सिर्फ आत्मा की गहराई से महसूस किया जा सकता है। पिता ही तो होता है जिसका रिश्ता संतान की आत्मा और शरीर से होता है। पापा आप ही हो जिसने मुझे नाम दिया। समाज में पहचान दी। आप से ही मुझमें साहस और संस्कार पनपे हैं। आपने ही मुझे बुरे वक्त और बुरी नजर से बचाया है। रोटी के हर निवाले के साथ मेरी खुशहाली की दुआएं की हैं ईश्वर से मेरी कामयाबी की ऊंचाईयां मांगी हैं। आपने ही पढ़ाया है मुझे भलाई का पाठ। अच्छाई और बुराई में फर्क बतलाया है। आप से ही हुआ था मुझे सही और गलत का ज्ञान। भले और बुरे की पहचान। मैं आपको मिस कर रहा हूं पापा?
घर और परिवार से दूर आज जब मैं अकेला हूं मुझे आपकी जरूरत महसूस होती है पापा। सोचता हूं आप होते इन हालातों में मेरा सम्बल होते। मुझे याद है आपकी खु्रली सोच और दूरदृष्टि ही थी जब आपकी बहू की नौकरी लगी और आपने उसको अपने आशीर्वाद और सीख के साथ खुशी-खुशी विदा किया। वो जब अपने स्कूटर पर ऑफिस जाने लगी तो आपने उससे आपका पर्दा करना भी छुड़वा दिया। आप ही थे जो मुझसे कहा करते थे कि बेटा कोई नौकरी के लिए मेहनत कर लो या ये पत्रकारिता ही करोगे? काश मैंने तब आपका कहा सुना होता पापा? मेरा मन पत्रकारिता में ही लगा था। भले ही आज मैंने अपने लक्ष्य को पा लिया पर मन का संतोष अब भी न पा सका पापा। आज आपको याद कर आपके हृदय की विशालता को नमन करता हूं पापा।
मैंने तो आपको कभी जवान देखा ही नहीं पापा? मैं आपकी नौ संतानों में आठवां जो था। मेरा एक भाई रहा नहीं सो मैं सातवां हुआ। आपकी जो छवि मेरी आंखों में बसी है वह एक कर्मठ, संयमी, धैर्यवान, स्वाभिमानी, धीर-गंभीर और जीवन से संघर्षशील किसी उम्रदराज पुुरुषार्थी इंसान की सी है। आपका घर के काम-काज में व्यस्त एकाकी स्वभाव ही मेरे मानस पटल पर बरबस उभर आता है। सुबह दूध लाने से लेकर रात सोने के लिए हम सबके बिस्तर लगाकर घर के दरवाजे पर ताला जड़ आंगन की बत्ती बुझाने तक आपकी सक्रियता मेरी आंखों में आज भी किसी डॉक्यूमेंटरी फिल्म की तरह चलती है। सुबह जल्दी उठना और पैदल ही दफ्तर के लिए निकल जाना भी मुझे याद है। शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर लौटना और लौटते में हम बच्चों के लिए फल लाना नहीं भूलना भी मेरे जेहन में है। रात हमारी पढ़ाई के बारे में जानना और हमें पढऩे के लिए प्रेरित करना भी मैं नहीं भूला हूं। क्या मैंने पढ़ाई के लिए आपको कभी सताया था पापा?
आज जब मैं आपके पोते को समझाता हूं उसे उसका अच्छा कॅरियर बनाने के लिए प्रेरित करता हूं, उसे अपने शरीर की स्वस्थता के लिए समझाता हूं, उसे कम्प्यूटर के सदुपयोग के लिए कहता हूं, टीवी पर समय जाया करने से टोकता हूं, सम्भलकर और सुरक्षित वाहन चलाने के लिए बोलता हूं, पढ़ाई करते हुए लिख-लिख कर अभ्यास करने की सलाह देता हूं तो आप बहुत याद आते हो पापा। तब न अपना घर था, खेल के संसाधन, टीवी था न ही घर में कोई दुपहिया या चौपहिया वाहन, दो कमरे और दस हम परिवारजन। काम-काज के साथ तमाम साधन-संसाधनों के अभाव में परिवार के साथ इतना संतुलन कैसे बैठा लेते थे पापा? पापा आपको शत्-शत् नमन।

3 comments:

  1. जाने के दस साल बाद एक बेटे का सच्‍चा स्‍मरण।


    मन के संतोष का कोई पैमाना नहीं लेकिन मन के भावों को बड़े ही सहजता और आत्‍मीयता से सबके सामने रख दिया है आपने। एक बेटा, जब अपने संघर्षशील बाप का स्‍मरण करता है तब निश्चित रूप से उस बाप की साधना धन्‍य हो उठती है।

    गुप्‍ताजी, आपने मन के अंदर से बात निकाली है। शाब्दिक आडम्‍बर नहीं, कहीं दिखावा नहीं। कहीं छुपाव नहीं। आपका मन बोला है और दिमाग चुप रहा है, शायद पहली बार !


    पत्रकारिता कम बात नहीं गुप्‍ताजी, सरकारी नौकरी करते तो क्‍या करते, पेंशन लेते, बूढ़ापे में बगीचों की हवा खाते और मर जाते। प्राय : ऐसा ही करते हैं लोग। आपने सही पेशा चुना है, हमें गर्व है एक योग्‍य बाप के योग्‍य बेटे पर।


    स्‍वर्गीय आत्‍मा को हमारा भी नमन्।

    ReplyDelete